क्रांति की पुकार


  क्या बहुजन समाज अपने अधिकारों के प्रति आंशिक तौर पर भी जागरूक है? शायद नही। कुछ जत्याभिमानी लोगों ने इन्हें जानवर समझा और इन्होंने इस उपाधि को झट लपक लिया।अपनी उपलब्धि मान इसे ही बना ली अपनी पहचान। हां हम हैं दो पैर वाले जानवर लेकिन दिखते मानुष सादृश्य हैं। मनुष्य सामाजिक जानवर है। वह अपने नांद और खूंटा से इतर सामाजिक दायरे की सीमा को व्यापकता देने में सक्रिय रहता है इसलिये सामाजिक प्राणी है। यदि वह भी अपने क्षुदा शांति और परिवार की दहलीज में सिमट जाय; अपनी सोच का दायरा वहीं तक सीमित कर दे तब वह जाने अनजाने सामाजिक प्रत्यय का स्वतः त्याग कर देता है, और रह जाता है सिर्फ और सिर्फ़ जानवर।

     बेहतर होता कि धर्म, सम्प्रदाय,जाति की संकुचित सीमा निर्धारित न होती तब हमारे देश की एक पहचान होती। राष्ट्र एक प्रतीक के रूप में कल्पित होता! और उसकी अखण्डता के उत्तरोत्तर वृद्धि के लिए एकीकृत प्रयास होता! हमें स्वेच्छा या मजबूरी में यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि कामचोरों की आलस्य में पड़े रहने और ऐय्याशी के समस्त श्रोतों पर हक जताने की भूख ने देश को अखण्ड ही नही रहने दिया। कर दिया इसके टुकड़े, खंड-खंड कर एक अपराजेय समाज और देश को हिन्दू हारों के दास्तान के रूप में इतिहास के पन्नों में दर्ज करा दिया, विखंडित भारत का नाम। एक घिनौने प्रवृत्ति के स्वार्थ में मदान्ध होकर जिस तरह से वर्ण और जाति के नाम पर पूरे समाज को तितर-बितर कर दिया गया है,उससे संभव है कि किसी की स्वार्थपूर्ति हुई हो,परन्तु राष्ट्र की एकता-अखंडता घायल ही हुई है। समाज को विभाजित करने के तेज़ धारदार खंजर से लहू लुहान राष्ट्र कराह रहा है। अमर बेल की तरह परजीवी वर्ग जिनका सिद्धांत है:- *न हर चले न चले कुदारी बैठे भोजन देय मुरारी* ने कितना अनैतिक मानसिक दिवालियेपन का प्रदर्शन किया है। क्या खूब दुःस्साहस दिया है। ईश्वर की बनाई हुई दुनियां को ईश्वर की मर्जी के खिलाफ़ ही ऐसा छितराया कि इकट्ठे होने की संभावना ही ख़त्म कर दिया है।

     अच्छे लोग स्वर्गवासी होते हैं,सीधे स्वर्ग जाते है और बुरे लोगों की मौत होती है। उन्हें नर्क भोगना पड़ता है। स्वर्ग और नर्क का मायाजाल मकड़ी के जाले की तरह है,परन्तु  थोड़ा सा विषम है। अपने बुने जाले में कीट पतंगो को फंसाने के चक्कर में मकड़ी स्वतः उलझ कर अपना दम तोड़ देती है। लेकिन इस स्वर्ग-नर्क के बुने गये जाल में परजीवी नही अपितु फंसता है निरीह, निपट गंवार। वज़ह साफ हैं जमीन पर अपने शरीर रखकर चलने वाले कीड़े मकोड़े स्वयं की ताक़त पर भरोसा करते हैं और धरती पर खड़े होकर अकड़ कर चलने वाले अपने को ज्ञानी, धर्मात्मा,परमज्ञानी व सिद्ध-पुरूष मान आस्था के नाम पर पाखंड के समक्ष समर्पित कर देते हैं। *कोई नृप होई हमै का हानी*। भगवान जो भी करेगा ठीक ही करेगा। भूल जाते हैं कि भगवान का अपहरण कर शैतान उनके स्थानों पर कब्जा जमा कर बैठ गया है। बहुजन समाज के लोग आस्था के आवरण में अपने को ढ़क लेते हैं। हर संभव कोशिश करते हैं कि उनका गँवारूपन व गोरूपन इस छद्म रजाई में छिप जाएँ। परजीवी; परजीवी होता है उसकी आँखे अनाड़ी को ढूंढ ही लेती हैं। यहीं से शुरू होता है जोंक द्वारा बहुजन का लहू पीने का तांडव। 

        अंध मनोवृत्ति मनुष्य को अधोगति की तरफ़ खिचती है। यह मनःस्थिति व्यक्ति के सोचने की क्षमता न्यून कर देती है। व्यक्ति कूपमण्डूक हो शैतान को भगवान, डकैत को परोपकारी, कुख्यात को विख्यात, क्षत-विक्षत को विद्वत मंडली का नक्षत्र और बकैत को सिद्ध पुरुष मान लेती है। यहीं से प्रारबद्ध होता है निज हाथों से सभी लोकों को गवाने का मार्ग। इन अनुकरणों से स्पष्ट हो जाता है कि अंध-विश्वास, अंध-भक्ति और अंध-श्रद्धा की भट्टी से उत्पादन शुरू हो गया है। इन गुणों का रेखांकन प्रतिबिंबित कर देता है कि अब इनमें विरोध और विद्रोह के वीर्य का अस्खलन हो चुका है। क्रांति की चिंगारी बर्फ़ की सिल्ली के नीचे ढ़क चुकी है। परजीवी के चेहरे से चिंता की लकीरें मिट जाती है,संतुष्ट हो जाता है कि हमारे मार्ग का रोड़ा,

स्वतः मंदबुद्धि की मोटी कथरी ओढ़ मेरे कंटीले रास्ते को भी समतल बना रहा है। बुद्धि पर आस्था का पड़ा मोटा पर्त ही अधम लोगों को सक्षम बनाने के अभियान में संलिप्त हो जाता है। 

      व्यक्ति के अंदर की शक्ति का समर्पण:- अंध-विश्वास, अंध-श्रद्धा, आस्था और अंध-भक्ति को जन्म देती है। अधिकारों की भूख व्यक्ति के आंतरिक शक्ति का उत्सर्जन करती है। जब प्रकाश व ज्ञान के किरणों की तीव्रता एकीकृत होकर जब व्यक्ति के मस्तिष्क पर पड़ती हैं,"तब अंध-श्रद्धा, अंध-विश्वास, अंध-भक्ति, आस्था और पाखण्ड को जला कर भस्मीभूत कर देती है। फिर वह इंसान हो जाता है। न कोई दलित होता है, न पिछड़ा होता है और न ही ब्रह्मा के मुख, भुजा और उदर से पैदा होता है। सभी का उद्गम मां का गर्भ ही है, गर्भ से इंसान जन्म लेता है न कि भगवान या शैतान। 

   संपूर्ण अधिकारों से आच्छादन हेतु कुरीतियों के संहार व लूट पर प्रहार के सामर्थ्य की आवश्यकता अर्वाचीन भारत में भी रही है और प्राचीन भारत में भी है। पकवान बनाने के लिए जिन-जिन सामग्रियों की आवश्यकता पड़ती है वह सब सामग्री आपके घर में उपलब्ध है परन्तु आप सामग्रियों को या तो आस्था के नाम पर भस्म कर देते हैं या फिर किसी परजीवी को दान कर देते हैं। भस्म व दानोपरान्त पकवान न मिलने की शिकायत क्या मूर्खता का परिचायक नही है?

    सत्ता हमेशा वीरों, दूरदर्शियों, आत्मनिर्भर, विवेक-शील व ऊर्जावान और उत्साही लोगों का वरण करती है। धर्म भीरू ,ओछी हरकत व स्वयं को आस्था के नाम पर समर्पण कर परजीवी आय का श्रोत बनने वालों के हाँथ भिक्षा पात्र होता है सत्ता का मुकुट नही। हे असीम शक्तियों के स्वामी इंसान! क्या आप में स्वालंबन की कुब्बत दिखेगी या चलता रहेगा मुर्खम् शरणम् गच्छामि?

     एक व्यक्ति ने देश को लोकतंत्र दिया, वयस्क मताधिकार दिया, संविधान में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार का मूलभूत अधिकार दिया, सत्ता के मुकुट वरण की समस्त सामग्री दी; ईश्वर मानना तो दूर उसे महान विभूति मानना भी आपने गंवारा न किया। उस पुरोधा की आत्मा तब घायल होती हैं जब वह नक्षत्रों से धरती पर देखता है कि जिन लोगों के सिर पर सत्ता का मुकुट होना चाहिए था उनके हाँथों में भीख मांगने का कटोरा है। पिछड़ी जाति के कितने लोगों के दिल में बाबा साहब डाॅ अम्बेडकर के लिए आदर है? यदि है तो पिछडी जाति से पिछड़ा वर्ग बन अपने सम्पूर्ण अधिकारों के लिए सत्ता के मंदिर पर कब्जा करो! क्रांति होनी चाहिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सुरक्षा के लिए, न कि आस्था के नाम पर मरने मारने के लिए। एक परजीवी के भरण-पोषण के लिए। उसके व्यवसायिक लाभ के लिए खुद को साम्प्रदायिकता के दावानल में ढ़केलने के लिए। लोग 18-18 घंटे काम करके अंधे कुँए में तेज़ नाव चला सकते हैं। योग करके भी मिथ्याभिमान त्याग का साहस नही कर पाते। थेथरोलाॅजी को अपनी शक्ति बना सकते हैं। और आप अपने संवैधानिक अधिकारों व बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए क्रांति करने में भी संकोच करते हैं। 

*गौतम राणे सागर*

   राष्ट्रीय संयोजक,

संविधान संरक्षण मंच।

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