तिरंगा मेरी जान अभिमान है मेरा

 


तिरंगा मेरी जान अभिमान है मेरा

   भारत की शान, देश की पहचान, नागरिकों का अभिमान है तिरंगा। हमें आज यह नया शौक़ नही चर्राया है। पीढ़ियों से इस झण्डे की हिफ़ाज़त के लिए प्राणों की आहुतियां दी है। जब 54सालों तक लोगों को तिरंगा फहराने में लज्जा आती थी तब भी हमने देश की निगहबानी के लिए अपने प्राणों को दांव पर लगाया है। तिरंगे की शान के कुछ भी कर गुजरने को तत्पर रहे हैं। आज अचानक से तिरंगे के प्रति उन लोगों में नफ़रत की बजाय सम्मान कैसे जग गया? दोहरा चरित्र कैसे चलेगा माधव सदाशिव गोलवरकर को गुरू भी मानना और तिरंगे का सम्मान भी करना? क्या है आख़िर इस कूटनीतिक व्यूह रचना का तात्पर्य? चेले हमेशा गुरू के पदचिन्हों पर आगे बढ़ते हैं तिरंगा को हर नागरिक अपनी डीपी बनाये का मशवरा देने वाले उन महानुभाव से जानने की इच्छा है क्या उन्होंने गोलवरकर को अपने राजनीतिक गुरू की संज्ञा से बेदखल कर दिया है?

    हमारी धमनियों में बहने वाला लहू शुद्ध है शुद्व। मिलावटी खून धमनियों को ब्लास्ट कर देता है। अशुद्ध रक्त बहने की इजाजत नही देता। हमारे डीएनए में भारत के मिट्टी की खुशबू आती है। हम कोई यूरेशियाई नस्ल नही है जहां मिलावट की भरमार रहती है। जुलाई 14,1946 को नागपुर की जनसभा को संबोधित करते हुए गोलवरकर ने कहा; यह भगवा ही है जो समस्त भारतीयों का नेतृत्व करता है यह ईश्वर का अवतार/मूर्त रूप है। हमें पूर्ण विश्वास है कि एक दिन सम्पूर्ण राष्ट्र भगवा के समक्ष नतमस्तक होगा। समाजवाद, साम्यवाद और लोकतन्त्र असहनीय है।

      14 अगस्त 1947 को दिए गए गोलवरकर के बयान; बिल्ली के भाग्य से छिकहर टूटने से जिन लोगों के हाथ में सत्ता आ गई है वह हमारे हाथों में तिरंगा थमाने की कोशिश करेंगे परन्तु हिन्दुओं द्वारा यह तिरंगा कभी भी सम्मान का कारण नही बनेगा। त्रिशब्द अपने आप में एक पाप है तिरंगा निश्चित तौर पर देश में मनोवैज्ञानिक रूप से बुरा प्रभाव डालेगा। यह अशुभ और हानिकारक है। देश स्वतंत्र होने के बावजूद जिन गोलवरकर ने हर एक मौके पर तिरंगा का अपमान किया है उनके चेले तिंरगा को डीपी बनाने की वकालत किस मुंह से कर सकते हैं? जो व्यक्ति लोकतन्त्र की बजाय सर्वसत्तावाद की वकालत करता हो उसके चेले इतने एहसान फरामोश कैसे हो सकते हैं? 

        कहीं ऐसा तो नही कि गोलवरकर के चेले गुरू और देश दोनों को झांसा देकर तिरंगा यात्रा की आड़ में अपना कोई बड़ा व्यवसायिक लाभ तो नही साध रहे हैं? तिरंगा देश की जान रहा है इसकी शान में प्रत्येक नागरिक इसके समक्ष श्रद्धा से अपना सिर झुकाता रहा है। प्रत्येक 15 अगस्त और 26 जनवरी को पूरा देश राष्ट्रगान करता है। तिरंगे को पिंगली वैंकेया ने 1921 में ही डिज़ाइन किया था 15 अगस्त 1947 से तिरंगा भारत का राष्ट्रीय झण्डा है। तिरंगा किसी जुमलेश्वर, महाराज झुठाधिराज के कहने से देश के नागरिकों की डीपी नही बन रहा है। स्वतंत्रता दिवस के समय से ही तिरंगा देश के प्रत्येक नागरिकों के दिल पर राज करता आ रहा है। हां यह भी सच है कि आज भी कुछ आस्तीन के सांपों के जिह्वा पर तिंरगा के प्रति सम्मान जग तो जाता है परन्तु तिरंगे के उच्चारण से ही उनके दिल पर काला नाग रेंगने लगता है।

       कोई हमें यह न सिखाए कि तिरंगे के प्रति हमें सम्मान प्रकट करना है। कोई छलिया हमें सलाह न दे कि हमें सफ़ाई कैसे रखनी है। कोई बहुरूपिया हमें न समझाए कि हमें कूड़ा कैसे बीनना है। तिरंगे का सम्मान हमने तब भी किया है जब बचपन में हमारे जंगलों पर गद्दार उद्योपतियों को कब्ज़ा दिलाने के लिए हमारी अंगुलियों को काट दिया गया परिवार के सदस्यों को हमारे ही देश के सुरक्षा बलों द्वारा हमारे सामने ही गोलियों से भून दिया गया। सफ़ाई के बारे कोई हमें ज्ञान न दे शौच से भरे गटर में भी उतरकर हम सफ़ाई करने से नही घबराते। दम घुटने की वजह से कई बार हम जान से भी हाथ धो बैठते हैं। तब भी देश को साफ़ रखने की जिम्मेदारी से पीछे नही हटते। हम फ़ोटो सेशन नही चलाते। जिन्हें सफ़ाई करने का नया नया शौक़ चर्राया है हम उन्हें निमंत्रण देते हैं यदि वाकई सफ़ाई करने की इच्छा है तो आइए उतरिए हमारे साथ शौच भरे गटर में। यकीन मानिए एक बार के अनुभव से ही फ़ोटो सेशन चलाने के अभिनय से जीवन भर के लिए तौबा कर लेंगे।

          कूड़ा बीनने की कला हमें न बताएं। हमारा पेट भरता है इसी से। हम हाथ में दस्ताना और मुंह में मास्क लगाकर कूड़ा नही बीनते है। समुद्र तट पर तो बिल्कुल कूड़ा उठाने का फ़ोटो सेशन नही करते। कूड़े में टहलने वाले जिस कीड़े ब्लिस्टर बीटल के देखते ही आपकी पतलून गीली हो जाती है वह दिन में कई बार हमें काट लेते हैं। बावजूद इसके हम दिन में एक ही कपड़े पहने मस्त रहते हैं। दिन में पांच पांच बार हमें कपड़े नही बदलने पड़ते। सही बात तो यह है कि हमारे पास कपड़े ही नही है तो बदले कहां से? मत आजमाइए हमारी देशभक्ति को। मत बांटिए हमें देशभक्ति का प्रमाण पत्र। अन्यथा एक बार सटक गई तो सारा अभिनय बाहर निकाल देंगे। मेहरबानी करके हमारी देशभक्ति, हमारे व्यवसाय, हमारे पेशे, हमारे धैर्य और हमारे संयम का परीक्षण बंद करिए। तिंरगा हमारे दिल में रचता बसता है। यही हमारी पहचान है।

*गौतम राणे सागर*

  राष्ट्रीय संयोजक,

संविधान संरक्षण मंच।

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