ब्राह्मणवाद और मानववाद में अंतर
सर्वेश द्विवेदी जी हमारे पुराने परिचितों में है। उन्होंने उम्र में तकरीबन आठ दशकों की सफलता पूर्वक यात्रा कर ली है । राम सेवक संघ (RSS) से जुड़े हैं। यह हमारी हर पोस्ट पर टिप्पणी करते हैं, देश की एकता व अखण्डता की दिशा में हमें कुछ उत्तरोत्तर करने की इनसे प्रेरणा मिलती है। हमारी तरफ़ से इनके प्रति आभार! आज मैं इनकी टिप्पणी पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा था, जिसमें ब्राह्मणवाद को परिभाषित करने का प्रसंग उपस्थित हो गया। हमनें प्रयास किया कि ब्राह्मणवाद और मानववाद में अंतर कर सकूँ! तदोपरान्त स्मरण हुआ कि इसे अपनी वाल पर टैग कर दूँ। शायद लोग आलस्य में टिप्पणी न करें बावजूद इसके वह कुछ प्रेरित तो हो ही जाएंगे।
द्विवेदी जी यह जातिवाद देन किसकी है? धार्मिक उदण्डवाद कौन फैला रहा है?एक्ट ऑफ फ्राड को एक्ट ऑफ गाॅड कौन कह रहा है? हर किये गये वादे को जुमला कहना पुनः उसी की पुनरावृत्ति को उत्तरदायित्व कहना, एक जाति विशेष को उन्मादी बना विनाश को उग्र राष्ट्रवाद के चश्मे से विकास देखने को उकसाना,विध्वंसक को राष्ट्रवादी व एक सच्चे देशभक्त को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा घोषित करना आखिर किस द्रव्य का नशा है? उद्योगपति कभी किसी का सगा नही होता। गिरगिट से भी तीव्र गति से रंग बदलता है इनके लिए देश को विनाश के दावानल के मुहाने पर खड़ा करना यह पापात्म कृत्य नही तो और क्या है? एक व्यक्ति अपने निकम्मेपन को छिपाने के लिए प्रतिपल नये लतीफ़े सुना रहा है। देश रसातल की तरफ़ अग्रसर है परन्तु एक नशेड़ी उसे न्यू इंडिया बता रहा है।
द्विवेदी जी यदि कोई यह सोच रहा है कि पुरातन की व्यवस्था पुर्न-प्रतिपादित कर प्रचंड जात्याभिमानी मनोवृत्ति की पुनरावृत्ति की जा सकती है तो यह उसका भ्रम है। शिक्षा से साज़िशन वंचित किया गया समाज डिग्रीधारी हो साक्षर बन गया है। समय शिक्षित होने पर भी मजबूर कर देगा। तब वह समझ जाएगा कि दरअसल भारतभूमि पर एक्ट ऑफ फ्राड को ही एक्ट ऑफ गाॅड बताकर कुछ बहुरूपिये अपने को उच्च घोषित करने की फोबिया में लिप्त हैं।
यह जातिवाद तभी समाप्त हो सकता है," जब हिन्दू धर्म के सियापे में पड़ा देश की आबादी का आधे से भी बड़ा हिस्सा चिंतन करना सीख जाएगा। यही एक ऐसा भू-भाग है आज तक अधिकांशत: बंजर ही पड़ा है। शारीरिक रूप से हृष्ट-पुष्ट परन्तु खोपड़ी में पड़े भेजे को खर्च करने में महा कंजूस। जिस दिन यह समाज का बड़ा हिस्सा सवाल करना शुरू कर दे कि यदि हम सह-धर्मी होने के नाते हिन्दू हैं और हर काम में सह-योगी भी तब सह-भागी क्यों नहीं?
जो धर्म के नाम पर अपने को जन्म से उच्च घोषित करे, नित नये छल से सह-धर्मियों का अधिकार छीनने का उपक्रम करे उसे ही कहते हैं ब्राह्मणवादी। ब्राह्मणवादी होने के लिए ब्राह्मण होना आवश्यक नही;वह किसी जाति,धर्म व सम्प्रदाय का हो सकता है। नित सह-धर्मी व स्व-जन को ही नीच व अधम बनाने की फैक्ट्री चलाता हो या यूँ कहें कि अपनी सुविधानुसार वह जब चाहे इन्हें कहे और अधिकारों के बटवारे की बारी आये तब यह कह:- जलील करते हैं कि:-
जे बरनाधम तेलि कुम्हारा, स्वपच किरात कोल कलवारा।
नारि मुई गृह संपति नाशि, मुड़ मुड़ाई होहिं सन्यासी।।
ते विप्रन संग आपु पुजावहिं। उभय लोक निज हाथ नसावहिं।।
भावार्थ: तेली कुम्हार चाण्डाल किरात कोल कलवार जो वर्णों में अधम हैं अपनी पत्नी के मर जाने पर सर घुटवाकर संयासी बन ब्राह्मणों से पूजा करवाते हैं और उन्हें दोनो हाथों से मुंह मांगा दक्षिणा देकर खुद की दुनिया का नाश करा लेते हैं।
एक बार सोचें जरूर लुटेरा स्वतःआपकी मूर्खता पर आप की ही खिल्ली उड़ा रहा है।आप हैं कि इसे भी अहो भाग्य समझ रहे हैं।
गौतम राणे सागर,
राष्ट्रीय संयोजक,
संविधान संरक्षण मंच।

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