वास्तव में राज्य की सत्ता छल से हासिल की गई प्रचंड बहुमत के आधार पर संसद में की गई बकवास पर निर्भर नही करती। न ही प्रांतीय सदस्यों के विवरणों पर। राज्य की रक्षा के लिए बनाए गए कानून पर बिल्कुल नही। राज्य की प्रलयंकारी नीतियों को चुनौती देने वाले साहसियों को भयभीत करने के लिए दण्ड के विधान करने वाले न्यायालय पर तो कतई नही।
सत्ता का इकबाल निर्भर करता है प्रबंधकों तथा प्रशासकों के आचरण से जनसाधारण में उपजे सामान्य विश्वास पर। यही विश्वास एक मात्र सार्थक उपाय है। यह विश्वास कानून और लोगों की नैतिक धारणाओं को सम्मान देने वाले निस्वार्थ व ईमानदार लोगों के हाथों में राष्ट्र की बागडोर होने से उत्पन्न होती है।
अंतिम सच्चाई यह है कि सरकार और व्यवस्था जन सामान्य को लम्बे समय तक आतंकित कर सत्ता को स्थिर नही रख सकती। सरकार तो जनहित के पदों पर नियुक्त कर्मचारियों की निष्ठा और कार्यकुशलता से उत्पन्न होने वाले विश्वास से ही चलती है। लतीफे सुनाने और राॅलेट एक्ट के अधिनियमन से क्रूरता के पदचिन्ह छोड़े जा सकते हैं परन्तु सत्ता के नैतिक चरित्र का प्रदर्शन असंभव है।
*गौतम राणे सागर*,
राष्ट्रीय संयोजक,
संविधान संरक्षण मंच।

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