मैं प्रतिबद्ध हूं... मैं भारत की ब्यूरोक्रेसी (अफ़सर शाही ) हूं

 


मैं प्रतिबद्ध हूं.....मैं भारत की ब्यूरोक्रेसी (अफ़सर शाही ) हूं। हमने भी प्रतिष्ठा परक व्यक्तित्व का प्रतिमान गढ़ा है। लोग हमारे भी कद्रदान थे। हमारे वादों पर लोगों को भरोसा था। हमसे संपर्क होने पर देश के साधारण नागरिकों का उत्साह बढ़ जाता था। वह मान लेते थे कि कलेक्टर और कप्तान साहब से मिल लिए हैं, अब समस्या का निदान हो ही जाएगा। यह था हमारा जलवा। काली रंग की एंबेसडर से निकलने पर लोगों के कान खड़े हो जाते थे, लोगों की फुसफुसाहट शुरू हो जाती थी कि आज कलेक्टर साहब का दौरा है। किसी बड़े अपराधी की शामत आने या किसी हरामख़ोर बाबू की बजने वाली है। कप्तान के साथ साथ कलेक्टर साहब का दौरा साधारण नागरिकों में रक्त संचार बढ़ा देता था। उन्हे यकीन हो जाता था कि अब सूदखोरों, लुच्चों, गुंडों से ही नहीं सामंतवादी व्यवस्था से भी निजात मिल जायेगी। यह रुतबा था हमारा।

       वज्रपात हो इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर जिसने हमें भौतिकता की चकाचौध में ऐसा लपेटा कि उसके पाश से निकलना मुश्किल हो गया है। किवदंतियों में जब लक्ष्मण नाग पाश की जद में आ गए तब हम सांसारिक लोग वैभवशाली जीवन से इतर कैसे रह सकते हैं? जो सुविधाएं कलेक्टरी और कप्तानी में मिल जाती हैं, लाट साहब जैसा बंगला, नौकर चाकर बेसिहाब मान मर्दन, भ्रष्ट होने की चतुर्दिक खुली हवाएं, संभावनाएं वैसी लूट की छूट और कहां मिलेगी। हमारी आवश्यकताएं हमें प्रतिबद्ध कर देती हैं। अफ़सर होने का गरूर काफूर और अरबपति बनने के सपने आने लगते हैं। राजनीतिक हमसे दो नही चार कदम आगे हैं। भांप लेते हैं हमारी कमज़ोरी। ज़िले से हटा सचिवालय के छोटे से कमरे में कैद कर देने की धमकी हमें शासन के आगे घुटने टेकने पर मजबूर कर देती है।

     हमारा ऊरूज; जिस पर हमें अभिमान था। गरीब को अन्याय,अत्याचार से निजात दिलाने का हमने जो सपना देखा था अब धूल धूसरित हो गया है। सत्ता के चारण में रात दिन लगे रहना होता है। दैहिक उत्पीड़न की भट्टी में पिसते गरीब, लाचार, मजलूम, दैनिक मजदूर जब अपनी फरियाद लेकर आते हैं, कोशिश तो बहुत करता हूं कि उनकी मदद हो, परंतु असहाय हूं चाह कर भी एक पीड़ित की सहायता नही कर पा रहा हूं। हां: मालूम है हमें कि लोगों को सताया जा रहा है। उनकी ज़मीन हड़पी जा रही है। अपने जात्याभिमान के प्रदर्शन के लिए उनकी चमड़ी उधेड़ी जा रही है। हमारी ज़िम्मेदारी भी यही है कि हम कानून व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त रखे। गरीब को न्याय और असहाय की सहायता में मेरे क़दम उठे। लेकिन उत्पात करने वाले सरकार के प्रिय हैं इनके खिलाफ़ कार्यवाही आफ़त ले कर आती है।

     स्थानांतरण का भय मुझे कायर तो बनाता ही है। देश की सर्वोच्च परीक्षा उत्तीर्ण कर न्याय के मार्ग पर चलने के नेक मकसद से भटकाता भी है। मेरे अंदर यही द्वंद चरम पर है। करूं तो क्या करूं? अरबपति बनने के सुनहरे सपने को लात मार दूं, निज हाथों से करोड़ों इकठ्ठा करने के अवसर को जाया कर दूं? मन बहुत है; अपने अंदर इकठ्ठा प्रशासनिक गुणों का प्रदर्शन करूं! क्या होगा ज्यादा से ज्यादा स्थानांतरण ही होगा न? विश्वस्त हूं जो लकीर मैं खींच कर जाऊंगा मेरा स्थापन्न उसे गति देगा! जब मैं अकेले में होता हूं ख़ुद से बाते करता हूं कि क्या ऐसा ही होगा? क्या गारंटी है कि नवागंतुक कलेक्टर और कप्तान साहब लोगों को न्याय ही दिलायेंगे? भौतिक सुख की चकाचौध उन्हें अपनी आगोश मे नही दबोचेगी, क्या उन्हें बख्श देगी या उनमें न्यायायिक पुरुषार्थ इतना अधिक होगा कि वह धक्का देते हुए आगे बढ़ जाएंगे? जवाब ढूंढने में मिलती है निराशा ही निराशा। मैं सारी सुविधाएं छोड़ भी दूं तब भी क्या यातना सहते गरीब को न्याय मिल जायेगा? शायद नही: क्योंकि अब हम लोगों का ज़िले के मुख्यालय के मुखिया के रूप में स्थानांतरण का लिया जाने वाला निर्णय प्रशासनिक गुणों को देख कर नही लिया जाता है। बल्कि तय होती है बोली कौन सत्ता पक्ष के सहयोग में मजबूती से खड़ा होगा। नैतिकता के पतन का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना होता है। साष्टांग दंडवत करना पड़ता है। सिर पर अशोक की लाट जो कि भारत की आन, बान, शान है, धारण करते हुए किसी के चरणों में गिरने की मनाही है फिर भी करना पड़ता है।

      जब नैतिक पतन हो ही गया है, तब हमारे हाथों लोकतंत्र का गला घोटा जाया या भूखों का फ़र्क क्या पड़ता है? हमारी स्वामी भक्ति सरकार के प्रति है न कि संविधान के प्रति। सरकार कहेगी विपक्ष के उम्मीदवार का नामांकन नही होने देना है तो हम नही होने देंगे। अब लोकतंत्र की अस्मत लूटती है तो लूटे। कल की बरक्स आज लूट जाय। मेरी सेहत पर कौन सा फ़र्क पड़ने वाला है? मेरी चरित्र पंजिका सरकार लिखेगी। भले ही पंजिका लिखने वाला हाथ हमारे किसी वरिष्ठ IAS,IPS का हो लेकिन उसमे रोशनाई तो सरकार की ही होगी। याद करें टी एन शेषन को चुनाव सुधार के लिए बड़ी धमा चौकड़ी मचाई। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए खूटा गाड़ के बैठ गए थे। लोगों ने यहां तक लिख दिया कि शेषन नाश्ते में नेता खाते हैं।

    वह भी जब चुनाव के मैदान में उतरे अपनी भद्द पिटवा ली। ज़मानत तक जब्त हो गई। हमें इतना भोला भंडारी न समझे। सेवानिवृत्त के बाद पछताने से बेहतर है कि अपनी झोली भर लें। जब अवसर आए तब झोला उठा के चल दें। यह दौर है ईमानदारी के नाम पर बेईमानी से अपनी झोली भरने का। हम प्रतिबद्ध हैं; कहां निम्न लाइन याद रखें।

 राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट।

अंत समय पछताएगा, जब प्राण जाएंगे छूट।।

*गौतम राणे सागर*

राष्ट्रीय संयोजक,

संविधान संरक्षण मंच।

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