एक नायाब हीरा शिवपाल............अन्याय के खिलाफ़ उठे बिगुल का जब भी तस्करा होगा, शूरवीरों के शौर्य की महागाथाएं लिखी जायेगी; शुरुआत होगी एक नाम से जिसे लोग शिवपाल सिंह यादव कहते हैं। यह नाम नही प्रतीक है अदम्य साहस का, सक्षम है अन्याय का गला घोटने में,गुंडों की छाती पर चढ़ मूंग दलने में। लोग सत्ता के संरक्षण में अपराध खात्मे का हुंकार भरते हैं पंरतु यह शख्स अपने जिगर, सामर्थ्य और विश्वास के दम पर गुंडा दमन में पूर्णत: सक्षम है।
यह माहिर हैं सियासत के शतरंज पर बिछने वाले मोहरों के बेहतर संयोजन व सधी हुई चाल चलने मे। माननीय मुलायम सिंह यादव की सदारत मे पनपने वाला समाजवादी आन्दोलन यदि परवान चढ़ा है तो उसमें शिवपाल जी का लहू उसी तरह उपयोग हुआ है जिस तरह खेतों की सिंचाई में जल का प्रयोग होता है। अपने सियासी जीवन की शुरुआत इन्होंने सहकारी बैंक के अध्यक्ष पद पर 1988 में चुनाव जीत कर की और 1991 तक प्रभावशाली ढंग से अपने दायित्वों का निर्वाह किया।1995 में इन्होंने ज़िला पंचायत का चुनाव जीता। इसी बीच उप्र 13वी विधान सभा का मध्यावधि चुनाव हुआ हुआ और यह जसवंत नगर से चुनकर विधान सभा सदस्य बनें। तब से लगातार यह उप्र की राजनीति के केंद्र बिंदु बने हुए हैं। कहने को यह एक क्षेत्रीय दल के नेता हैं, मुख्यमंत्री की कुर्सी तक कभी पहुंचे नही। इसके बावजूद भारतीय सियासत में यह किसी पहचान के मोहताज नही हैं। इस नाम में देश की सियासत में हलचल मचाने की बेहतरीन कुव्वत रखते हैं। 1996 से यह जसवंत नगर से विधान सभा का चुनाव जीतते आ रहे हैं।
इनकी सत्ता संकलन रणनीति के कौशल का प्रदर्शन 2003 में देखने को मिला। जब मायावतीजी ने भाजपा से अंतर्द्वंद के चलते मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देने के लिए अपने समर्थकों के बीच कांशीराम इको गार्डन मैदान का चयन किया। वह एक तीर से दो निशाना साधना चाहती थीं। पहला उन पर सत्ता लोलुप होने का धब्बा लग रहा था और भाजपा के दबाव में कार्य करने का भी। वह इस इस्तीफ़ा रूपी परमाणु से दोनों धब्बेदार दामन धुल लेना चाहती थी। मायावती जी के इस्तीफे के बाद भाजपा की गिद्ध दृष्टि सपा और बसपा के विधायकों को तोड़ कर अपनी सरकार बनाने पर टिकी थी। मुलायम सिंह यादव हताश थे उन्हें कुछ सूझ नही रहा था कि आखिर भाजपा को सरकार बनाने से कैसे रोका जाय!
पिक्चर का क्लाइमैक्स अभी बाकी था दोस्त। हिरोईक इंट्री हुई शिवपाल सिंह यादव की और उन्होंने नेता जी से मिलकर कहा कि यदि कुछ धन की व्यवस्था हो जाय तब हम सरकार बनाने के लिए कम पड़ रहे आवश्यक विधायकों का इंतज़ाम कर लेंगे। आपको तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने का इंतज़ाम हो जाएगा। साथ में बैठे अमर सिंह की तरफ़ देखते हुए नेताजी ने इशारा किया कि इन्हें धन वन मत देना यह हमें बेवकूफ बना रहे हैं। लेकिन अमर सिंह शिवपाल जी की काबिलियत से वाकिफ थे; पूछा कितने की जरुरत पड़ेगी। शिवपाल जी द्वारा बताई गई धन राशि का आधा हिस्सा अमर सिंह ने तुरंत उपलब्ध करा दिया, कहा कि इतने से ही काम चलाना पड़ेगा।
शिवपाल सिंह यादव एक नाम नही आन्दोलन है यूँ ही नही कहा जाता है। धुन के पक्के शिवपाल जी जुट गए अपने अभियान मे। 142 सपा विधायकों के अलावा 68 विधायकों की व्यवस्था शिवपाल जी ने ऐसे की कि नेता जी को हवा भी नही लागी। जब शिवपाल जी ने उन सभी विधायकों को नेता जी के समक्ष प्रस्तुत किया तब नेता जी भी हक्के बक्के रह गए।
अंततः 30अगस्त 2003 को समय 10.10 मिनट पर मुलायम सिंह जी ने तीसरी बार उप्र के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। लक्ष्मण मेला पार्क शपथ ग्रहण समारोह में सितारों की जुटी भीड़ के बीच शानो शौकत के साथ विष्णु कांत शास्त्री महामहिम द्वारा दिलाई गई संविधान की शपथ के साथ नेता जी मुख्यमंत्री की गद्दी पर फिर आरूढ़ हो गए। सितारों में जहाँ अमिताभ जया बच्चन के साथ उपस्थित थे वहीं राज बब्बर व अनिल अम्बानी नीता के साथ। जार्ज फर्नांडीज रक्षा मंत्री कार्यक्रम की शोभा बढ़ा रहे थे।
उप्र में भाजपा को सत्ता से च्युत्त करने के लिए शिवपाल जी की काबिलियत की आवश्यकता है। भाजपाइयों की फितरत की काट यदि किसी के पास है तो उस व्यक्ति का नाम है शिवपाल सिंह यादव। जब सभी दल जोगी की संविधान विरोधी गतिविधियों के खिलाफ़ जन प्रपीड़क मुद्दों पर आवाज़ उठाने की बरक्स अपने मुंह पर अलीगढ़ का ताला जड़े बैठे हैं तब शिवपाल सिंह यादव जी गैर भाजपा वाद की रणभेरी भर सभी के मुंह पर जड़े तालों को खोलने के लिए चाभी लेकर जंगे मैदान मे कूद पड़े हैं।
*गौतम राणे सागर*
राष्ट्रीय संयोजक,
संविधान संरक्षण मंच।

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