खुदाई चौकीदार
स्वर्ग नगर का एक राज्य था। दयानाथ नामक राजा इस क्षेत्र पर राज करता था। कहने को इस राज्य में लोकतन्त्र था परन्तु वास्तविकता इसके ठीक उलट थी। नारदीय मीडिया राजा के गुणगान में हमेशा व्यस्त रहती। राजा के हर कदम को प्रमाणित करने में इतना विभोर रहती कि यदि राजा पक्षपाती दृष्टिकोण से चोर को महात्मा और महात्मा को चोर के उपमा देता तो यह मीडिया गोबर का इतना चोंथ करती कि वास्तविक महात्मा उसके नीचे दब जाता और चोर को महात्मा के रूप में प्रस्तुत करने में यह सफ़ल हो जाते। दयानाथ ने राज्य में अय्यारों की एक फ़ौज खड़ी कर रखी थी।
शासन की कोई पद्धति हो पक्ष विपक्ष दोनों मौजूद रहते हैं। हर शासक अपने विपक्षी को रौदने की फिराक में रहता है। दयानाथ इस फन में माहिर था। उसने अपने विरोधी को देश का विरोधी साबित करने की कूट रचना की, सफ़ल भी रहा। कारण स्पष्ट था अपनी रणनीति में प्रयोग होने वाले हर यंत्र का वह बखूबी ध्यान रखता था। उनके सुविधा में किसी वस्तु की कमी नही होने देता। राज्य की जनता के धार्मिक भावनाओं का इमोशनल ब्लैक मेल करने के खेल में भी वह माहिर था। अंधविश्वास और पाखण्ड को बढ़ावा देने के लिए वह सरकारी खजाने को खोल देता। अंधविश्वास की धार्मिक यात्रा पर निकले बेरोजगार युवकों, युवतियों व बुजुर्ग यात्रियों के लिए वह मादक द्रव्यों की व्यवस्था करता तथा अपने सिपहसालारों से उन पर फूलों की वर्षा तो करवाता ही साथ ही साथ उनके पैर धुलवाता और मसाज भी करवाता। चोला बदलने की क्रिया में वह पारंगत थ। प्रतीत होता जैसे यह विधा उसे विरासत में मिली हो।
दिशाहीन राज्य की जनता को और चाहिए क्या? उसे शिक्षा के लिए विद्यालय,स्वास्थ्य के लिए अच्छे अस्पताल, रोजगार प्रतिभूति की कहां फिक्र थी। अपने अय्यारों और गोबर की चोथ करने वाली मीडिया गैंगों की सक्रियता से जब भक्तों की एक बड़ी फ़ौज तैयार कर ली तब दयानाथ अपने असली रंग में धीरे धीरे आने लगा। उसने शायद यह नीति शास्त्र पढ़ रखा था कि जो व्यक्ति पूजनीय हो जाता है उस पर जनता अविश्वास नही करती। अपने अय्यारों व गोबर गणेश मीडिया के सहयोग से वह ख़ुद को पूजनीय स्थिति तक स्थापित कर चुका था।
जिस राज्य की आर्थिक स्थिति ठीक रहती है वही राज्य लम्बे समय तक अखण्ड रह सकता है अन्यथा राज्य के विघटन को रोकना असंभव है। राज्य कोई उत्पादन यूनिट तो है नही जो नागरिकों के उपभोग की वस्तुओं का निर्माण करे, उससे खज़ाने को मज़बूत करे। राज्य सरकारी कल कारखानों का बड़े पैमाने पर स्थापना कर सकती है। लेकिन इस प्रयोग से राज्य के सभी संप्रदायों को रोज़गार देना पड़ेगा अन्यथा विद्रोह की सम्भावना प्रबल बनी रहेगी। जितना अधिक लोगों को रोज़गार उतना ही अधिक आर्थिक समृद्धिशाली लोगों की संख्या बढ़ेगी। पक्षपाती और निरंकुश शासन के लिए आवश्यक है कि कम से कम लोग आर्थिक तौर पर मजबूत रहे। तभी उन पर लम्बे समय तक शासन किया जा सकता है।
दयानाथ कर्मयोगी था। गोबर की चोथ के बयानों को आधार बनाएं तो वह दिन में 18-18घण्टे मेहनत करता था। वह रात दिन इसी उधेड़बुन में रहता कि कैसे राज्य के अधिकांशतः लोगों को बेरोजगार रखा जाय ताकि उन्हें सरकारी इमदाद के नाम पर अपना मुरीद बना कर रखा जा सके। कहने को उसका सारा मंत्रिमंडल था परन्तु वह अपने मंत्रिमंडल की बैठक उसी समय आहूत करता जब खुद के विरोधियों को देश का विरोधी साबित करने की नौबत आती। राज्य के नागरिकों को बड़े पैमाने पर दीन हीन बनाने की सुपारी वह अपने उद्योगपति मित्रों के हाथ सौपता। उसके दो उद्योगपति मित्र थे ठग्गूराम और गबन मल। जब भी सरकारी संस्थानों को पलीता लगाना होता वह उन्हें इन्हीं दोस्तों के हाथों में नीलम कर देता। नीलामी का ऐसा नायाब तरीका न किसी ने सुना होगा और न ही किसी ने देखा होगा। सारा संस्थान इनके हाथों मुफ़्त में तो बिकता ही, कबाड़ साफ़ करने और उस जगह की चौकीदारी की रकम भी सरकारी खज़ाने से इनको अदा की जाती।
राज्य के तकरीबन हर घर में महिलाओं ने अपने बुरे दिन के लिए कुछ न कुछ धन सहेज कर रखा था।18-18 घण्टे मेहनत करने के बाद चौकीदार ने अपने खुदाई चमत्कार से सत्ता में आने से पहले ही योजना बना रखी थी। राज्य के हर व्यक्ति को कैशलेस कैसे किया जाय! स्वर्ग नगर पर चढ़ाई करने के पहले ही भूमिका लिखी जा चुकी थी। शूरू से जुमले और अफ़वाह का आश्रय लिया गया था कि इस राज्य में काला धन बहुत हो गया है। सत्ता में बैठे कई लोगों ने विदेशों में काला धन जमा कर रखा है। जिस दिन मैं सत्ता में आऊंगा सारा का सारा काला धन वापस लाऊंगा। राज्य के सभी नागरिकों के खाते में 15-20 लाख रुपए यूं ही आ जाएंगे। लालची लोग और फरेबी नायक का रिश्ता इसी झूठ की बुनियाद पर टिका है। लालची जनता झांसे का शिकार होकर ठग विद्या के माहिर दयानाथ पर विश्वास कर फंस गई।
राज्य की जनता को विश्वास दिलाया गया कि राज्य में बढ़ रहे आतंकवाद का आधार काला धन है। हमें दहशतगर्दी की कमर तोड़नी है। पड़ोसी राज्य ने हमें कमज़ोर करने के लिए हमारे राज्य में जाली नोटों का नेटवर्क फैला रखा है। वास्तविकता से इतर अफवाहों के गर्म बाजार ने दयानाथ को अवसर दे दिया ख़ुद के
नागरिकों को कैशलैस करने की योजना को अमलीजामा पहनाने की। बाहर से काला धन पाने की प्रत्याशा में राज्य की जनता कठिन परिश्रम से अर्जित घर में रखे धन से हाथ धो बैठी। पुरूष ज्यादा संचय कर नही पाता, महिलाएं अपने पति की नज़र बचाकर जो भविष्य निधि के लिए जो धन संचय की थी उसे दयानाथ ने अवैधानिक टेंडर घोषित कर दिया। ख़बर यह भी उड़ी कि दयानाथ के दोनों उद्योगपति दोस्तों ने ख़ुद के काले धन को बड़े पैमाने पर सफ़ेद कर लिया।
खुदाई चौकीदार की नोटबंदी योजना भी राज्य के नागरिकों की कमर तोड़ने में असफल रही। नागरिक थोड़ी देर के लिए मूर्छित हुए, संभले, उठे और फिर चल पड़े अपनी राह। डिरेल हुई आर्थिक गाड़ी का पहिया फिर चल पड़ा मंज़िल की ओर। बारी थी अब दयानाथ के बेहोश होने की उसका यह वार खाली गया। मुसीबत खड़ी हो गई उसके सामने इतना अचूक निशाना साधा फिर भी शिकार दम नही तोड़ा। दयानाथ के सामने अब दोहरी समस्या खड़ी हो गई, अपने परोपकारी, न्यायवादी, कर्मयोगी चेहरे को बचाने रखने और राज्य की जनता को दरिद्र बनाने की। वह भी एक बेजोड़ धनुर्धर था, उसके तरकश में तीरों की कोई कमी नही थी। उसके तरकश का ब्रह्मास्त्र अभी भी तूणीर की शोभा बढ़ा रहा था। एक दिन दयानाथ फिर जनता के समक्ष प्रकट हुआ, जुमलों की बौछार शुरू की: हमने महसूस किया आप लोगों को अपना व्यवसाय करने में बड़ी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। सरकारी कर्मचारी आपको इस टेबल से उस टेबल और उस से तिस तक चक्कर लगवाते हैं। हम चाहते हैं कि आपको इस मुसीबत से मुक्ति मिल जाय।
राज्य की जनता मस्त, लगी नाचने कूदने*भूत प्रेत निकट नहि आवै, महावीर जब नाम सुनावै*। इन अबोध को कहां ज्ञान था कि महावीर सुविधा उपलब्ध कराने के नाम पर गब्बर सिंह का रूप धारण कर लेंगे और नाजिल कर देंगे अपने नाम का टैक्स। भूत प्रेत भगाने के आकांक्षी व्यवसायियों को भूत से मुक्ति तो नही मिली हां गले महादैत्याकार रूपी गब्बर सिंह टैक्स ज़रूर पड़ गया। अब तो व्यवसायियों के आंखों के सामने लाल पीला दिखने लगा। हर दुकानदार के पास पहुंच गए जीएसटी अधिकारी दो चार खाकीधारी के संग। कहा: सरकार का आदेश है आप सब अपने व्यवसाय का ठीक ठीक हिसाब बना ले। सम्पूर्ण कर सरकारी खज़ाने में जमा करा दे अन्यथा कानूनी पचड़े में फंस जाएंगे। हां सरकार ने हमसे कहा है कि हर व्यवसाई की जमा रकम वापस की जाएगी। सभी के खाते में यह रकम वापस हो जाएगी, अभी रकम इसलिए जमा कराई जा रही ताकि लाल फीताशाही आपका उत्पीड़न न कर सके।
भगतराम जो नामी गिरामी व्यापारी थे हिम्मत करके सिपाहियों से पूछा सरकारी खाते में जमा करने पर हमें अपने जमा रकम की रसीद तो मिल जाएगी ना दरोगा जी? कड़कनाथ दरोगा ने मुलायम होते हुए कहा कि यदि आपको भरोसा नही है तब आप टैक्स जमा करने से रहने ही दें। रखे रहे अपने पास। लेकिन याद रखिए जब बार बार जीएसटी वाले नोटिस भेजेंगे और घर पर छापा मारेंगे तब देते रहियेगा जवाब। आखिरकार भगतराम ने दिल मज़बूत किया और दयानाथ के बोल वचन को याद कर उसकी स्तुति की, इस उम्मीद से सिपाहियों के साथ चल पड़े कि दयानिधान ने हमें लालफीताशाही से बचाने के लिए क्या युक्ति सोची है। जीएसटी के नाम पर जमा कराई गई रकम की वापसी के लिए आज भी लोग इन्तजार कर रहे हैं। उड़ी उड़ी खबरें हवा में तैर रही हैं कि दयानाथ का काम करने का यही तरीका है जो उनके भवसागर में समाया फिर निकल नही पाता। भवसागर के अथाह सागर में जनता को डुबोने की क्रिया को ही दयानाथ खुदाई चौकीदार की संज्ञा देते हैं।
*गौतम राणे सागर*
राष्ट्रीय संयोजक,
संविधान संरक्षण मंच।

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