अनुसूचित जातियों के मसाइल जस के तस। पिछड़ी जातियों की दशा और भी दयनीय। कल्पना करें जिन महानविभूतियों ने अपने जीवन की आहूति इस मकसद के लिए दी थी कि देश में एकरूप समाज की स्थापना होगी। विधायिका,कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया में सभी का आनुपातिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होगा। जहां विपुल विषाद माहौल का चहुंओर बोलबाला हो इस अज़ीयत देह (कष्टदायी) देश के अद्यतन हालात क्या उनकी रूह को सुकून दे रही होगी? ऐसा क्योँ होता है कि लायक मां बाप की औलादे नालायक निकल जाती है अक्सर? वर्णित द्वय जातियों के बच्चों को अधिक सहूलियत मिल जाने पर इनके बिगड़ने का मार्ग प्रशस्त होता है क्या?
अनुसूचित जातियों को आरक्षण दिलाने के लिए बाबा साहब डॉ अम्बेडकर ने अपने चार-चार बच्चों गंगाधर, रमेश , इंदु और राजरत्न की कुर्बानी दी। जिनके पिता अनुसूचित और पिछड़ी जातियों के बच्चों के सुनहरे भविष्य, चुपड़ी रोटी, लम्बी गाड़ियों और विलासिता से जीवन जीने के लिए व आलीशान बंगला उपलब्ध कराने के लिए जुग्राफिया तैयार कर रहे थे वह बच्चे कुपोषण और व्याधिग्रस्त होकर घुट घुट कर मर रहे थे। बाबा साहब डॉ अम्बेडकर के जीवन के समस्त त्याग, तपस्या और बलिदान से मिले अवसर का लाभ उठाकर आज आरक्षण के लाभार्थी अपने बीबी बच्चों के स्वार्थ में इतना मशगूल है कि आरक्षण के दायित्वों को समझने को तैयार ही नही। यदि यही सोच बाबा साहब ने भी प्रदर्शित की होती तो उनके बच्चे दुनियां की सारी खुशियां उनके कदमों में होती! यह आरक्षण के लाभार्थी खा रहे होते किसी का जूठन। पहन रहे होते किसी के फेंके गए चिथड़े। झोपड़ी बना कर रहने के नाम पर 24 घण्टे गुलामी करने के गिड़गिड़ा रहे होते।
यह नाशुक्र कैसे भूल जाते हैं कि वह जिस आरक्षण के ग्रह का आज चक्कर काट रहे है उस सैटेलाइट को बाबा साहब डॉ अम्बेडकर ने ही मुल्क की आईन में प्रक्षेपित किया है। यह आज जहां साहिबे मसनद हैं उस उपलब्धि को हासिल करने में उनकी व्यक्तिगत मेहनत है इन्कार का सवाल ही नही उठता लेकिन समाज का प्रतिनिधित्व करने के लिए ही उन्हें यह अवसर मिला है। क्या यह जुम्लः याद है उन्हें? निस्संदेह जहां लाभार्थियों की सफ़लता में 80% उनकी व्यक्तिगत मेहनत है वहीं 20%आरक्षण व्यवस्था का योगदान है। जिस स्रोत से उन्हें व्यक्तिगत प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर मिला है। संदेश स्पष्ट है कि आरक्षण के लाभार्थियों को अपनी समस्त उपलब्धि का 20% रॉयल्टी आरक्षण व्यवस्था के पोषण के लिए देना ही होगा अन्यथा दण्ड का प्राविधान है।
शायद यह वाक्य नियति करने में बाबा साहब से त्रुटि हो गई। अन्यथा कोई कारण नही प्रतीत होता कि आरक्षण लाभार्थी वर्ग इतने बड़े पैमाने पर एहसान फरा़मोश निकलता। बाबा साहब डॉ अम्बेडकर ने शायद मनन किया होगा कि यह लोग अपने नैतिक जिम्मेदारी को उच्च स्थान पर रखेंगे। मानव शास्त्र के अद्वितीय विद्यार्थी होने के बावजूद उनसे इतनी बड़ी त्रुटि हो कैसे गई? संभव है उन्होंने लाभार्थियों पर कुछ अधिक ही भरोसा जताया। इस वर्ग के प्रति वह पूरी तरह आशान्वित थे कि सब भले ही धोखा दे दें लेकिन यह लोग उनके सपनों को चकनाचूर नही होने देंगे।
डंडे या दण्ड के भय से सांचे में ढलकर दायित्वों के प्रति वफादार रहने वाला वर्ग इसके अभाव में मस्तीखोर हो गया। सामाजिक सरोकार के मुद्दों पर केन्द्रित होने को भी इसने अपने पिकनिक का पार्ट बना दिया। भूल गया कि सामाजिक सरोकार सूल है मनोरंजन का उपक्रम नही। भला हो लाभार्थी वर्ग के छोटे से समूह का जिसने अपने मज़बूत कन्धों पर इस पवित्र जिम्मेदारी का बोझ उठाए हुए हैं। संविधान के खिलाफ़ टेढ़ी होती भौंहें को चुनौती देता है ड्योढी की सीमा पार करने की हिमाकत न करें। बाकी तो पिंजड़े में कैद मुर्गों की तरह कटने से पहले पेट फटने तक दाना चुगने में व्यस्त और मस्त हैं।
वर्तमान में दिखावे और छलावे के लिए ही सही कल्प और गल्प की सरकार बाबा साहब डॉ अम्बेडकर के चित्र को प्रत्येक सरकारी दफ़्तर में लगाने पर मजबूर है। सरकार का यह कृत्य है तो; स्वांग ही लेकिन एक बात तो तय है कि उसे बाबा साहब के सहारे की नितान्त आवश्यकता है। उसे भान है कि बाबा साहब के बिना उसका काल्पनिक दुनियां ध्वस्त हो जायेगा। वह चाहते हैं कि डॉक्टर अम्बेडकर को मानने वाला समाज उन्हें दैवीय शक्ति के रूप में पूजने लग जाए। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्रान्ति के सूर्य के रूप में विख्यात उनके व्यक्तित्व के सन्देश को तलाशने का यत्न न करें। संघर्ष की गाथा को अपने चरित्र में समेटने की मुहिम का हिस्सा न बन जाए!
बाबा साहब के अनुयायियों के समक्ष विपुल संकट खड़ा हो गया है। वह मुख़ालिफ़ों की साजिशों, हथकंडों, फितरत से वाकिफ हैं। प्रतिकार के लिए तैयार भी हैं परन्तु इन आस्तीन के सांपों का क्या करें, जो खाते तो हैं बाबा साहब के नाम पर परन्तु मंगलाचरण करते हैं सैयाद का? आरक्षण के लाभार्थियों की नैतिक जिम्मेदारी थी कि समाज का वह तबका जो शैक्षणिक और आर्थिक तौर पर आज भी दैनिक दैहिक अजीयत(यातना) सहने को अभिशप्त है आरक्षण की रॉयल्टी से उसे देश की विकास की मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास करता! इस बिन्दु पर आज भी वह पूरी तरह विमुख है।
हमारे समक्ष जो सुलगता सवाल है वह यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि जो लोग बाबा साहब डॉ अम्बेडकर के ख़्वाब का मुल्क ता'मीर करने के मार्ग में मुदाख़लत (बाधा) बन रहे हैं उनसे मुत्तहिद रहा जाय या फिर मुनासिब होगा कि इनको लाभार्थी से अलहदा रखने का मुहिम अंजाम दिया जाय? क्या हम ऐसे मैकदः में मस्रू,फ मुह,तरम को बर्दाश्त करते रहे सिर्फ़ इसलिए कि यह समाज से ताल्लुक रखते हैं?
*गौतम राणे सागर*
हम भारत के लोग (We The People Of India)
0 टिप्पणियाँ