असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की अवहेलना क्यों..?

असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की अवहेलना क्यों..?
  लखनऊ /संविधान संरक्षण मंच के तत्वाधान में संगठित एवं असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को न्याय दिलाने के उद्देश्य से आज दिनांक 28 फरवरी को कांशीराम ईको गार्डन में इनके सत्कार में *कर्मयोगी सम्मान समारोह* आयोजित किया गया। 
      *संविधान संरक्षण मंच के राष्ट्रीय संयोजक गौतम राणे सागर* ने कहा कि देश की प्रगति में 93%के भागीदार अधिकारों से वंचित, नागरिक सुविधाओं से प्रवंचित, विडंबना कहें या साज़िश? सरकार इनके प्रति इतनी विमुख कैसे रह सकती है? क्या यह दलों को चुनावी फंड के रूप में मदद नही कर पाते, उपेक्षा सिर्फ़ इसलिए तो नही?नौकरशाही के ऐश्वर्य की व्यवस्था नही कर पाते हैं, फलतः यह महकमा भी इनकी समस्याओं के समाधान के प्रति उदासीन रहना श्रेयस्कर समझता है? या यह अपने कानूनी अधिकारों से अपरिचित हैं, संगठित आवाज़ उठा नही सकते इसलिए हर कोई इनके प्रति लापरवाह है। जो जितना बड़ा ज्ञानी उतना ही आत्म केन्द्रित। संभव है, आत्म केन्द्रित लोग इन्हें विकास की मुख्य धारा से जुड़ने की सुविधाओं से अलग थलग करने की साजिश करते रहते हैं। यथार्थ है कि देश की प्रगति में यह 93% सहयोग करते हैं। फिर भी कानूनी अधिकारों से वंचित क्यों?
      *नईम सिद्दीकी* ने कहा कि भारत एक सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं के प्रति निष्ठावान रहने वाला देश है। नागरिकों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार उपलब्ध कराना सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है। मुफ़्त शिक्षा, चिकित्सा और सुरक्षा नागरिकों का अधिकार है। सरकार इन दायित्वों से मुंह नही फेर सकती। हमारे यहां लोकतन्त्र है। यहां जनता द्वारा चुनी, जनता के हितों और जनता की ही सरकार है। सरकार में बैठे लोग जनता के सिर्फ़ प्रतिनिधि है। कोई राजा नही, कोई तानाशाह नही और न ही कोई सम्राट है। तब भी शारीरिक श्रम में लिप्त देश की बड़ी आबादी भूख से बिलबिलाती जिन्दगी के लिए अभिशप्त हैं। जिस देश में 93%लोग अपना खून जलाकर और हड्डी गलाकर रात दिन कड़ी मेहनत के लिए उपलब्ध हैं तब भी उन्हें खाने के लिए सरकार की भिक्षा पर निर्भर रहना पड़ रहा है। नैतिक सरकार देश के नागरिकों के हितों का ध्यान रखना अपना उत्तरदायित्व समझती है। किसी भी कर्त्तव्य के अनुपालन को नागरिकों के प्रति सरकार द्वारा किया गया कोई एहसान नही है। प्रतिनिधि होने की ड्यूटी है।
        *पी सी कुरील* ने कहा कि दैनिक मजदूरों को प्रतिदिन दैहिक यातना के क्रूर जूतियों की निरन्तर मार झेलनी पड़ती है। कम मेहनताना, उत्पीड़न, काम की बेरहम अवस्था, न कोई सामाजिक सुरक्षा न ही कोई लाभ, रहने के लिए न तो साफ़ सुथरा मकान न ही जीवन के लिए ज़रूरी सामग्री उपलब्ध है। मजदूर और मालिक के बीच कोई औपचारिक संबंध नही। यह विभेद उस देश में जहां का संविधान कानून की दृष्टि में सबको बराबर होने का गौरव प्रदान करता है। व्यक्ति की गरिमा और अवसर की प्रतिष्ठा की मृदुल भूमि तैयार करता है। इनसे ओवर टाईम काम लेना लोगों को ख़ूब भाता है लेकिन ओवर टाईम की मजदूरी देना अहंकार को चुनौती देने लगता है क्यों? क्या यह पेंशन के हकदार नही हैं, स्वास्थ्य बीमा क्यों नही मिलना चाहिए इन्हें? जब संगठित क्षेत्र और सरकारी मुलाजिमों को तमाम सुविधाएं मिलती है जैसे आने जाने के लिए गाड़ी घोड़े, टीए डीए फिर इन्हें क्यों प्रवंचित किया गया है?
       *बी डी नकवी* पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि असंगठित क्षेत्र में कार्यरत लोगों को कौशल विकास की शिक्षा देना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। यदि सरकार इस आवरण में छिप कर तर्क प्रस्तुत करती है कि इन लोगों को नौकरियां नही दी जा सकती क्योंकि यह अकुशल कारीगर हैं। सवाल यहां खड़ा होता है कि इन्हें अकुशल क्यों छोड़ा गया? इनका बड़प्पन देखें इन्होंने कभी शिकायत नही की। वजह साफ़ है इन्हें अपने कानूनी अधिकारों का ज्ञान नही है। क्या अनपढ़ लोगों के अज्ञानता का सरकार को दुरूपयोग कर उनके शोषण की मानसिकता प्रदर्शित करनी चाहिए?
         *डॉ आर एस जैसवारा* ने कहा कि किन कठिन परिस्थितियों में और खतरनाक जगहों पर यह काम करते हैं कभी योजना बनी कि इन स्थानों पर कार्य करने के लिए उन्हें किन किन सुरक्षा उपकरणों की जरूरत है? यदि इनके साथ कोई दुर्घटना हो जाए तो इन्हें मुआवजा न मिले अधिकारी हर संभव तिकड़म ढूंढने के यत्न होते हैं। क्या ज्ञान, विद्वता, समझदारी सिर्फ़ इस काम आयेगी कि किस तरह असंठित रहने वाले लोगों को चाबुक से पीटने का अवसर ढूंढा जाता रहे?
     *अजय कुमार रवि* ने कहा कि कब आंकड़े बटोरे जाएंगे कि इनके कार्य के स्थान से रहने के स्थान की दूरी कितनी है? कार्य के स्थान तक पहुंचने से पहले यह अपने शरीर की कितनी ऊर्जा खर्च चुके होते हैं? कार्य से छूटने के बाद अत्यधिक थके होने के बावजूद यह अपने झोपड़ी तक पहुंचने में और कितनी ऊर्जा खर्च करते हैं?आवश्यकता से अधिक श्रम करने से इनकी कितनी आयु घटती है? कितनी बीमारियां इन्हें अपने चंगुल में दबा लेती है? अंततः दबे पांव आकर मौत इनके प्राण हर अपने साथ ले उड़ती है और श्वांस विहीन शरीर को सड़ने के लिए निष्प्रभ छोड़ जाती है। 
       *अनीस अंसारी* आईएएस (से नि) ने कहा कि आठ घण्टे निर्धारित कार्य के समय को बढ़ाने की कोशिश क्यों हो रही है? क्या सरकार इनके शोषण में उद्योग घरानों के उपकरण का कार्य कर रही है? संविधान की मंशा के खिलाफ़ सरकार काम क्यों करना चाहती है? इनके स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए नियमों को बनाने और उसे कठोरता से अनुपालन के लिए सरकार संजीदा दिख क्यों नही रही है, इतनी उदासीनता क्यों?
      *आदित्य कौशल किशोर* स्मारक स्थल कर्मचारी नेता ने कहा  भविष्य निधि, मुआवजा, कर्मचारी राज्य बीमा इत्यादि सुविधाओं में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को शामिल करने पर सरकार को गम्भीर होना चाहिए। तनिक उदासीनता असहनीय है, इंसान और इन्सानियत के प्रति, कानून के प्रति। नागरिक अधिकारों के प्रति। मूलभूत सिद्धांत है कि सरकार और लोक सेवक/ अफसरशाही अपने कूप मंडूक सोच से बाहर निकले। मजदूरों के लिए ऐसे नियमों को अधिनियमित किया जाए ताकि मजदूर बाजार में इनके शोषण पर विराम लगे और मजदूरों को उन सभी भयावह स्थिति से निजात मिले, जैसे कम मजदूरी, कार्य करने की दुरूह अवस्था, मजदूर और मालिक के बीच सद्भाव, खतरनाक जगहों पर काम के पूर्ण सुरक्षा उपकरणों की उपलब्धता।
       उपस्थित सभी कर्मयोगी को शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया। मनवीर तेवतिया किसान नेता, सत्यवीर जाटव, अकील चौधरी, मुज्तबा ख़ान, इन्द्र प्रकाश बौद्ध, राजेश बाल्मीकि, सोहित यादव, गुरू प्रसाद इत्यादि लोगों ने अपने अपने विचार रखे।
     मंच के राष्ट्रीय महासचिव नवाब अली अकबर ने कार्यक्रम की अभूतपूर्व सफलता के लिए सभी अतिथियों एवं कर्मयोगियों का  धन्यवाद ज्ञापित किया।
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