मुज़फ्फ़रनगर,
कशाना-ए-क़मर, केवलपुरी मौहल्ला, मुज़फ्फरनगर में मुशायरा का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता शमीम किरतपुरी ने की और संचालन अल्ताफ मिशाल ने किया। क़मर अदबी सोसाइटी, मुज़फ़्फ़रनगर, उत्तर प्रदेश के सचिव अब्दुल हक़ सहर ने सभी शायरों का परिचय कराया।
मुशायरे में मुंबई से आए शायर हुकमचंद कोठारी असगर और ताबिश रामपुरी को सम्मानित किया गया
और उनके साहित्यिक योगदान के लिए सपास नामा, रिदा-ए-कमर, निशान-ए-कमर, और मुजफ्फर अहमद मुजफ्फर पुरस्कार प्रदान किए गए।
नूर सुल्तान पुरी, अमीर नहटोरी फरमान जहीर और खुर्रम सुल्तान सहारनपुरी विशेष अतिथि के रूप में शामिल हुए।
डॉ. सदाकत देवबंदी, जकी अंजुम सिद्दीकी, खुर्शीद हैदर, अशरफ हिलाल ,रबीद अख्तर,नवेद अख़्तर
सुशीला शर्मा, अनस आतिफ नाहीद समर कविश जुगाड़ देवबंदी, सिकंदर देवर यावी आस मुहम्मद अमीन ,तहसीन क़मर, सलीम जावेद केरानवी, जुनैद अज़हर आदि ने अपने कलाम से नवाज़ा।
अंत में, सचिव अब्दुल हक सहर और
संयोजक नाहिद समर कविश जुगाड़ देवबंदी ने सभी का धन्यवाद किया।
चंद अशआर आलमी याफ़्ता शोअरा के कलाम से....
ऐ मेरे दोस्त बता क्या ये मुनासिब होगा,
तू मेरे सामने ग़ैरों से मुखातिब होगा।
शमीम किरत पुरी
हिज़्र में तेरे भटकता रहा संस्था सहरा,
इस सफ़र में कहीं आराम किया हो तो बता।
खुर्शीद हैदर
पसंद आती हे किस को क़ैद सब गमगीन बेठे हैं,
में पिंजरे के परिंदों को उड़ा कर देख लेता हुं।
नूर सुल्तान पुरी
बड़े ख़लूस से हम तुम मिले थे जहां,
उदास उदास वो राहैं सलाम कहती हैं।
अमीर नहटोरी
ताबिश तुझे फ़ंकार तो कहता है ज़माना,
इस फन से मगर मां दवा तक नहीं आती।
ताबिश रामपुरीं
प्यास शिद्दत की जला देती है कितनी रूहैं,
सोचता कब है समंदर में नहाने वाला।
हुक्म चन्द कोठारी असग़र
अब ज़ुल्म की तारीख़ भला कोन लिखेगा,
जब ज़ुल्म को लिखने में क़दम टूट रहे हैं।
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