देवबंद के उर्दू महल में शानदार मुशायरे का आयोजन, देशभर से आए शायरों ने बांधा समां

देवबंद के उर्दू महल में शानदार मुशायरे का आयोजन, देशभर से आए शायरों ने बांधा समां


सहारनपुर/देवबंद
कस्बा देवबंद के उर्दू महल में बीती रात बाबा नाहीद समर काविश जुगाड देवबंदी की ओर से एक अजीमुश्शान मुशायरे का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता बुजुर्ग शायर अब्दुल्ला राही ने की, जबकि मास्टर शमीम ने शमां रोशन कर आगाज़ किया। संचालन जकी अंजुम सिद्दीकी ने किया।


मुशायरे की शुरुआत खुशतर देवबंदी की नात-ए-पाक से हुई, जिसके बाद देर रात तक एक से बढ़कर एक कलाम पेश किए गए। इस अवसर पर मुंबई से तशरीफ लाए प्रसिद्ध शायर हुक्म चन्द कोठारी और ताबिश रामपुरी को शॉल ओढ़ाकर तथा मुजफ्फर अहमद मुजफ्फर अवार्ड व सिपास नामा पेश कर सम्मानित किया गया। इसके साथ ही कमर अदबी की असनाद भी भेंट की गई।


मुशायरा रात्री 9 बजे से शुरू होकर 1:30 बजे तक जारी रहा। कार्यक्रम के समापन पर मुंबई से आए मेहमानों को “रिदा-ए-समर” पेश की गई। आखिर में कार्यक्रम के कन्वीनर समर काविश जुगाड ने सभी अतिथियों का शुक्रिया अदा किया और सदर अब्दुल्ला राही ने मुशायरे के इख्तिताम का ऐलान किया।


मुशायरे में शायरों ने अपने कलाम से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। पेश हैं कुछ पसंदीदा अशआर जो श्रोताओं की खूब दाद बटोरने में कामयाब रहे—


चुने हुए अशआर

हुक्म चन्द कोठारी
ज़िन्दगी दर तो कभी दार लगे है मुझको
शाखे गुल ऐसी के तलवार लगे है मुझको

ताबिश रामपुरी
हमारी दोस्ती की लोग ताबिश कद्र करते हैं
लिहाजा दुश्मनी का शहर में चर्चा नहीं करते

अब्दुल्लाह राही
मेरे सलाम पे दुश्मन का मुस्कुरादेना
मुझे यकीन है पत्थर पिघलने वाला है

जकी अंजुम सिद्दीकी
हम तो तुम्हारी बज़्म में कपड़े पहन के आ गए
कुछ लोग इतने तेज हैं चेहरे पहन के आ गए

वसीम शहपर
खता तुम्हारी नही है खता हमारी है
और इस लिए है कि लहजे में इनकिसारी है

वली वकास
हुशयार कर रहा हूं जरा अहतियात से
अब मेरे बाद आप से किया किया कहेंगे लोग

सरवर देवबंदी
किसी से दिल को लगाना ना भूलकर सरवर
यहां तो प्यार भी धोखा दिखाई देता हे

दिलशाद खुशतर
अपने महबूब से नाराज ना होना खुशतर
उसने ठुकरा दिया तुझको तो किधर जाएगा

सुहेल आतिर
इस तरहा हिज़्रो गम का सफर काटता हूं मैं
तिशना लबी है और नमक चाटता हूं मैं

तनवीर अनवर
चांद जाते जाते भी मुस्कुरा के कहता है
सो भी जाओ अब अजमल दिन निकलने वाला है

शमीम किरत पुरी
ज़िन्दगी रोज नए रंग दिखाती है मुझे
मुस्कुराता हूं अगर मैं तो रुलाती है मुझे

समर काविश देवबंदी
जलते हुऐ अश्कों की जलन छोड़ रहा है
बिस्तर पे वो फुरकत की थकन छोड़ रहा है

अनवर हुसैन अनवर
सारी बातें भूल जाने की नहीं
ज़ख्म भी सारे नहीं होते रफू

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