बच्चों की आँखों पर स्क्रीन टाइम का खतरा,2050 तक आधी आबादी मायोपिया से हो सकती है प्रभावित: डॉक्टर धीरज मिश्रा

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, गोंदलामऊ के अधीक्षक और वरिष्ठ चिकित्साधिकारी डॉ. धीरज मिश्रा ने बच्चों की आँखों की रोशनी स्वस्थ रखने के उपायों और आवश्यक जानकारी पर जागरूकता अभियान चलाया है। उन्होंने बताया कि बच्चों की आँखों पर बढ़ता स्क्रीन टाइम और सीमित इनडोर जीवनशैली अब एक गंभीर जनस्वास्थ्य चुनौती बन चुकी है।

अध्ययनों के अनुसार, वर्ष 2050 तक दुनिया की लगभग 50 प्रतिशत आबादी मायोपिया (निकट दृष्टिदोष) से प्रभावित हो सकती है। इसके अतिरिक्त, लगभग 1 अरब लोगों में हाई मायोपिया विकसित होने की आशंका है, जिससे आँखों की गंभीर बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, जब बच्चे लंबे समय तक मोबाइल, टैबलेट या किताबों को बहुत नज़दीक से देखते हैं, तो आँखों की फोकसिंग प्रणाली पर लगातार दबाव पड़ता है। मायोपिया में आँख का आकार सामान्य से अधिक लंबा होने लगता है, जिसके कारण वस्तु की छवि रेटिना पर बनने के बजाय उसके आगे बनने लगती है।
चिकित्सकों का कहना है कि प्राकृतिक धूप में खेलने से रेटिना में डोपामिन का स्राव बढ़ता है, जो आँखों की असामान्य वृद्धि को नियंत्रित करने में सहायक है। वहीं, कम आउटडोर गतिविधियाँ और अत्यधिक पढ़ाई या स्क्रीन आधारित 'नियर वर्क' बच्चों में मायोपिया के प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।
इस समस्या के समाधान के लिए कुछ महत्वपूर्ण उपाय सुझाए गए हैं। बच्चों को प्रतिदिन कम से कम 2 घंटे खुली धूप और आउटडोर खेल का अवसर देना चाहिए। '20-20-20' नियम का पालन करें, जिसके तहत हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर देखना आवश्यक है।
छोटे बच्चों को अनावश्यक मोबाइल उपयोग से दूर रखना चाहिए। स्कूलों में वार्षिक नेत्र परीक्षण अनिवार्य किया जाना चाहिए और घरों में डिजिटल अनुशासन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

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