क्रोनी कैपिटलिज़्म: सत्ता, पूँजी और लोकतंत्र के बीच बढ़ता असंतुलन

क्रोनी कैपिटलिज़्म: सत्ता, पूँजी और लोकतंत्र के बीच बढ़ता असंतुलन
      भारत की आर्थिक संरचना लंबे समय तक “मिश्रित अर्थव्यवस्था” के सिद्धांत पर आधारित रही है, जहाँ राज्य और निजी क्षेत्र दोनों विकास प्रक्रिया के साझेदार माने गए। स्वतंत्रता के बाद देश ने समाजवादी झुकाव वाली नीतियों के माध्यम से सार्वजनिक क्षेत्र को मजबूत करने का प्रयास किया, जबकि 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद निजी पूँजी और बाज़ार आधारित अर्थव्यवस्था को अधिक महत्व मिला। इन दोनों चरणों के बीच भारतीय लोकतंत्र ने संतुलन बनाने की कोशिश की। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक नई बहस तेजी से उभरी है — क्या भारत प्रतिस्पर्धी पूँजीवाद से आगे बढ़कर “क्रोनी कैपिटलिज़्म” की ओर बढ़ रहा है?
    क्रोनी कैपिटलिज़्म केवल आर्थिक शब्द नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक ढाँचे के लिए एक गंभीर चेतावनी है।

 इसका अर्थ ऐसी व्यवस्था से है, जिसमें आर्थिक सफलता बाज़ार की निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा से कम और सत्ता के निकट संबंधों से अधिक तय होने लगती है। यहाँ उद्योगपति और राजनीतिक सत्ता एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं। सरकार नीतिगत संरक्षण देती है और बदले में राजनीतिक व्यवस्था को आर्थिक समर्थन प्राप्त होता है। धीरे-धीरे यह गठजोड़ लोकतंत्र के मूल सिद्धांत — समान अवसर — को कमजोर करने लगता है।

           सामान्य पूँजीवाद में यह माना जाता है कि कोई भी व्यक्ति अपनी प्रतिभा, नवाचार और मेहनत के बल पर आगे बढ़ सकता है। लेकिन क्रोनी कैपिटलिज़्म में अवसर समान नहीं रह जाते। बड़े कॉरपोरेट समूहों को सरकारी परियोजनाओं, खनिज संसाधनों, बैंक ऋणों, भूमि अधिग्रहण, टैक्स छूट और नीतिगत बदलावों में प्राथमिकता मिलने लगती है। परिणामस्वरूप छोटे व्यापारी, मध्यम उद्योग और नए उद्यमी धीरे-धीरे प्रतिस्पर्धा से बाहर होते जाते हैं।
      भारत में यह बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि देश की अर्थव्यवस्था में असंगठित क्षेत्र और छोटे व्यवसायों की भूमिका अत्यंत बड़ी है। 

करोड़ों लोग छोटे व्यापार, कृषि आधारित उद्योग और स्थानीय बाज़ारों पर निर्भर हैं। यदि आर्थिक नीतियाँ केवल बड़े कॉरपोरेट हितों के अनुरूप बनती हैं, तो आर्थिक शक्ति का केंद्रीकरण तेज़ हो जाता है। इससे एक ऐसा ढाँचा तैयार होता है जहाँ कुछ समूह अत्यधिक शक्तिशाली हो जाते हैं, जबकि सामान्य नागरिक आर्थिक रूप से अधिक असुरक्षित महसूस करने लगता है।
क्रोनी कैपिटलिज़्म का सबसे प्रभावशाली हथियार “नीतिगत प्रभाव” होता है। 

जब किसी उद्योग समूह की सरकार तक सीधी पहुँच बढ़ जाती है, तब नीतियाँ सार्वजनिक हित के बजाय कॉरपोरेट हितों के अनुरूप ढलने लगती हैं। 

कई बार यह प्रक्रिया प्रत्यक्ष नहीं होती, बल्कि प्रशासनिक निर्णयों, नियमों में बदलाव, लाइसेंस प्रणाली, सरकारी निविदाओं और वित्तीय संस्थानों के माध्यम से धीरे-धीरे आकार लेती है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि यह गठजोड़ अक्सर कानूनी ढाँचे के भीतर रहकर भी असमानता को संस्थागत रूप दे देता है।

       चुनावी राजनीति भी इस समस्या का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। आधुनिक लोकतंत्र में चुनाव अत्यंत महंगे हो चुके हैं। राजनीतिक दलों को विशाल आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। ऐसे में कॉरपोरेट फंडिंग का प्रभाव स्वाभाविक रूप से बढ़ता है।

 जब चुनावी वित्तपोषण में पारदर्शिता कम हो और धन का प्रवाह सीमित समूहों के हाथों में केंद्रित हो जाए, तब यह आशंका और गहरी हो जाती है कि नीति निर्माण पर कॉरपोरेट प्रभाव बढ़ रहा है। लोकतंत्र केवल मतदान की प्रक्रिया नहीं है; यह संस्थागत निष्पक्षता और जनता के विश्वास पर भी आधारित होता है।

      भारत में बुनियादी ढाँचे, हवाई अड्डों, बंदरगाहों, ऊर्जा, दूरसंचार और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े क्षेत्रों में बड़े कॉरपोरेट समूहों की तेज़ी से बढ़ती उपस्थिति ने इस बहस को और तीखा किया है। सरकारें इसे विकास, निवेश और आधुनिकरण का प्रतीक बताती हैं। उनका तर्क है कि बड़े निवेश के बिना विश्वस्तरीय आधारभूत संरचना संभव नहीं। यह बात आंशिक रूप से सही भी है। किसी भी विकासशील राष्ट्र को बड़े उद्योगों और निजी निवेश की आवश्यकता होती है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है, जब प्रतिस्पर्धा सीमित होने लगे और आर्थिक अवसर कुछ चुनिंदा समूहों तक सिमट जाएँ।

        क्रोनी कैपिटलिज़्म का प्रभाव केवल अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहता। यह मीडिया, प्रशासन और सामाजिक विमर्श को भी प्रभावित कर सकता है। जब आर्थिक शक्ति अत्यधिक केंद्रित हो जाती है, तब सूचना और जनमत पर भी उसका प्रभाव बढ़ने लगता है। मीडिया संस्थानों की आर्थिक निर्भरता और कॉरपोरेट स्वामित्व लोकतांत्रिक बहस की निष्पक्षता पर प्रश्न खड़े कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में जनता तक पहुँचने वाली सूचनाएँ भी संतुलित न रहकर हित-प्रेरित होने का खतरा पैदा करती हैं।

     इतिहास बताता है कि जब भी किसी लोकतंत्र में आर्थिक शक्ति और राजनीतिक शक्ति का अत्यधिक केंद्रीकरण हुआ है, तब सामाजिक असंतोष बढ़ा है। लैटिन अमेरिकी देशों से लेकर रूस और एशिया के कई देशों तक, सत्ता-समर्थित पूँजीवाद ने आर्थिक असमानता को गहरा किया और संस्थाओं में जनता का विश्वास कमजोर किया। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण समाज में यह खतरा और अधिक गंभीर हो सकता है, क्योंकि यहाँ आर्थिक असमानता का सीधा प्रभाव सामाजिक स्थिरता पर पड़ता है।

      हालाँकि यह भी सत्य है कि हर बड़े उद्योगपति को “क्रोनी” कहना उचित नहीं होगा। उद्योग और निवेश किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था के आवश्यक तत्व हैं। निजी क्षेत्र रोजगार देता है, तकनीकी विकास लाता है और उत्पादन क्षमता बढ़ाता है। समस्या उद्योगों के अस्तित्व से नहीं, बल्कि अवसरों की असमानता और नीति निर्माण में पक्षपात से है। स्वस्थ पूँजीवाद वही माना जाएगा जहाँ प्रतिस्पर्धा खुली हो, नियम सब पर समान रूप से लागू हों और सरकार किसी विशेष समूह की संरक्षक न बन जाए।

          भारत के सामने वास्तविक चुनौती पूँजीवाद और समाजवाद के बीच चुनाव की नहीं, बल्कि पारदर्शिता और निष्पक्षता की है। यदि सरकारें नीति निर्माण में पारदर्शिता सुनिश्चित करें, संस्थाओं को स्वतंत्र बनाए रखें, छोटे और मध्यम उद्योगों की सुरक्षा करें तथा चुनावी फंडिंग में सुधार लाएँ, तो आर्थिक विकास और लोकतांत्रिक संतुलन दोनों साथ चल सकते हैं।

      लोकतंत्र की शक्ति केवल चुनाव जीतने में नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने में है कि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। यदि आर्थिक नीतियों का केंद्र केवल कुछ शक्तिशाली समूह बन जाएँ, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे प्रतिनिधिक व्यवस्था से प्रभाव-नियंत्रित व्यवस्था में बदलने लगता है।

      इसलिए आज आवश्यकता केवल आर्थिक विकास की नहीं, बल्कि ऐसे विकास मॉडल की है जिसमें अवसरों का विकेंद्रीकरण हो, संस्थाओं की स्वायत्तता बनी रहे और जनता को यह विश्वास हो कि राष्ट्र की अर्थव्यवस्था कुछ लोगों के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए काम कर रही है। तभी भारत वास्तव में एक संतुलित, न्यायपूर्ण और लोकतांत्रिक आर्थिक व्यवस्था की ओर बढ़ सकता है। 

 *गौतम राणे सागर*
   राष्ट्रीय संयोजक 
संविधान संरक्षण मंच।

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