रामपूर निवासी सामाजिक कार्यकर्ता राहेला खान ने प्रेस को जारी एक बयान कहा कि निर्भया कांड के बाद कानूनों में सुधार के बावजूद रेप की बढ़ती घटनाओं ने सरकार और पुलिस को कठघरे में खड़ा कर दिया है. उत्तर प्रदेश और राजस्थान में रेप और हत्या की घटनाओं ने इस मुदे को सुर्खियों में ला दिया है.
आखिर महिलाओं के खिलाफ ऐसे बर्बर मामलों पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है ? इस सवाल पर सरकारों और समाजशास्त्रियों के नजरिए में अंतर है. मुश्किल यह है कि सरकारें या पुलिस प्रशासन ऐसे मामलों में कभी अपनी खामी कबूल नहीं करते. इसके अलावा इन घटनाओं के बाद होने वाली राजनीति और लीपापोती की कोशिशों से भी समस्या की मूल वजह हाशिए पर चली जाती है. यही वजह है कि कुछ दिनों बाद सब कुछ जस का तस हो जाता है. वर्ष 2018 में हुए थॉम्पसन रॉयटर्स फाउंडेशन के सर्वेक्षण के मुताबिक, लैंगिक हिंसा के भारी खतरे की वजह से भारत पूरे विश्व में महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देशों के मामले में पहले स्थान पर था.
वैसे, रेप के सरकारी आंकड़े भयावह हैं. एनसीआरबी के आंकड़ों में बताया गया है कि वर्ष 2019 के दौरान रोजाना औसतन 88 महिलाओं के साथ रेप की घटनाएं हुईं. इनमें से 11 फीसदी दलित समुदाय की थीं. लेकिन साथ ही यह याद रखना होगा कि खासकर ग्रामीण इलाकों में सामाजिक वर्जनाओं के चलते अब भी ज्यादातर मामले पुलिस तक नहीं पहुंचते. इसे स्थानीय स्तर पर ही निपटा दिया जाता है. ऐसे में जमीनी आंकड़े भयावह हो सकते हैं. ऐसे मामलों को दबाने या लीपापोती की कोशिशों से अपराधियों का मनोबल बढ़ता है और वह दोबारा ऐसे अपराधों में जुट जाता है.
उत्तर प्रदेश में गैंग रेप का विरोध
ऐसा नहीं है कि सरकारों या पुलिस प्रशासन को ऐसे अपराधों की वजहों की जानकारी नहीं है. लेकिन समाजशास्त्रियों का कहना है कि राजनीतिक संरक्षण, लचर न्याय व्यवस्था और कानूनी पेचींदगियों की वजह से एकाध हाई प्रोफाइल मामलों के अलावा ज्यादातर मामलों में अपराधियों को सजा नही मिलती सामाजिक कार्यकर्ता राहेला खान ने हाथरस गैंग रेप घटना की कड़ी निंदा करते हुए बेरोजगारी को इसकी वजह करार दिया है.
दो साल पहले एनसीआरबी की रिपोर्ट में कहा गया था कि 2001 से 2017 के बीच यानी 17 वर्षो में देश में रेप के मामले दोगुने से भी ज्यादा बढ़ गए हैं. वर्ष 2001 में देश में जहां ऐसे 16,075 मामले दर्ज किए गए थे वहीं वर्ष 2017 में यह तादाद बढ़ कर 32,559 तक पहुंच गई. इस दौरान 4.15 लाख से भी ज्यादा मामले सामने आए. अगर इनमें उन मामलों को भी जोड़ लें तो विभिन्न वजहों से पुलिस के पास नहीं पहुंच सके तो तस्वीर की भयावहता का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है. गैर-सरकारी संगठनों का दावा है कि देश में अब भी रेप के ज्यादातर मामले पुलिस तक नहीं पहुंचते. लेकिन आखिर ऐसा क्यों है ? राहेला खान कहा कि "देश में रेप को महिलाओं के लिए शर्म का मुद्दा माना जाता है और इसकी शिकार महिला के माथे पर स्थायी तौर पर कलंक का टीका लग जाता है. बलात्कारी इसी मानसिक व सामाजिक सोच का फायदा उठाते हैं. कई मामलों में रेप का वीडियो वायरल करने की धमकी देकर भी पीड़िताओं का मुंह बंद रखा जाता है.”

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