सरकार और प्रशासनिक अधिकारियों की साज़िश से किस तरह किसानों, मज़दूरों की ज़मीन हड़पने का कुचक्र चल रहा है विश्लेषण करना प्रासंगिक होगा। यदि सरकार वाकई ज़मीन अधिग्रहण करना चाहती है तो वह किसानों की सहमति के बग़ैर भी यह कार्य संपादित कर सकती हैं। लेकिन सरकार सिर्फ़ रक्षा, रेलवे और हाईवे के लिए ही ज़मीन अधिग्रहण कर सकती है।
पीपीपी के लिए ज़मीन अधिग्रहण से पहले 70% किसानों की सहमति अनिवार्य रूप से लेनी होगी। प्राइवेट कम्पनी के लिए 80%किसानों की सहमति आवश्यक है।
सरकार जब ज़मीन अधिग्रहण करने की अधिसूचना ज़ारी करती हैं तब उसे सामाजिक प्रभाव का अनुमान लगाना होता है।
अधिसूचना ज़ारी करने के बाद जब भी ज़मीन अधिग्रहण की कार्यवाही होती है तब उसे इस तरह से मुआवजे देने पड़ते हैं। ग्रामीण ज़मीन का सरकारी मूल्य से चार गुना और शहरी ज़मीन का दोगुना। मुआवजा को एक उदाहरण से समझते हैं।
माना ज़मीन का सरकारी मूल्य ₹10 लाख है तब किसान को मिलेगा ₹40 लाख +100% हर्जाना= ₹80 लाख। यह सिर्फ़ ज़मीन का मुआवजा है। यदि घर है तो बदले में सरकार को घर भी देना होगा। विस्थापन के लिए ₹5 लाख प्रति परिवार विस्थापन शुल्क। प्रोजेक्ट में परिवार के एक सदस्य को नौकरी यदि नौकरी नही दी गई है तब ₹5 लाख सांत्वना के लिए। जब तक विस्थापित परिवार पूरी तरीक़े से स्थापित नही हो जाता है, 1 साल तक ₹3000 प्रति माह उसे भत्ता देना होगा।
चुंकि सरकार जनता को देश का मालिक तभी तक मानती है जब तक उसे उसके मत की आवश्यकता है। तत्पश्चात वह उद्योग घरानों व भू माफिया से सांठ गांठ करके किसानों की ज़मीन को ऐन केन प्रकारेण हथियाना चाहती है। इसलिए अधिग्रहण की कार्यवाही के बग़ैर भू माफिया और उद्योग घरानों की दलाली में लिप्त होकर प्रशासनिक अधिकारियों का बड़े पैमाने पर दुरूपयोग करती है। किसानों की ज़मीन छीनने का कुचक्र करती है।
सभी किसान भाइयों से अपील है कि वह मांग रखे कि हम अपनी ज़मीन मुफ़्त में देने को तैयार हैं। किसी तरह की अग्रिम धनराशि की आवश्यकता नही है। मुझे प्रोजेक्ट में पार्टनर बनाया जाए। ऐसी स्थिति में कोई भी किसान भाई बेरोजगार नही होगा। ज़मीन जाने की भी कोई चिन्ता नही होगी।
*गौतम राणे सागर*
राष्ट्रीय संयोजक
संविधान संरक्षण मंच।
0 टिप्पणियाँ