अक्षय तृतीया पर जैन धर्म का महत्व

सुरेंद्र सिंह- संवाददाता 
जनपद- फर्रुखाबाद मोबाइल नंबर -860 1168180

अक्षय तृतीया पर जैन धर्म का महत्व* 

भारत महान संस्कृति वाला देश है यहां पर पर्व त्यौहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है, हर त्यौहार के लिए प्रत्येक धर्म के लोगों की अपनी अपनी मान्यताएं ईई है हिंदू धर्म में जहां अक्ति या अक्षय तृतीया के दिन को बहुत शुभ माना जाता है तो वही जैन धर्म में भी इस दिन का महत्व कुछ काम नहीं है। 

जैन धर्म में अक्षय तृतीया पर दान का विशेष महत्व होता है जैन धर्म की मान्यताओं के अनुसार भगवान आदिनाथ ने सबसे पहले दान के महत्व को समझाया था और दान की शुरुआत की थी भगवान आदिनाथ राज पाठ का त्याग कर वन में तपस्या करने निकल गए उन्होंने 6 महीने तक लगातार ध्यान किया 6 महीने बाद जब उन्होंने सोचा कि इस समाज को दान के बारे में समझाना चाहिए वे ध्यान से उठकर आहार मुद्रा धारण करके नगर की ओर निकल पड़े नगर में तीर्थंकर मुनि को देखकर सारे लोग खुशी से झूम उठे और तीर्थंकर मुनि को अपनी सारी चीज देने के लिए आगे आ गये लेकिन वह नहीं जानते थे कि मुनिराज दुनिया की मोह माया को त्याग चुके हैं ऐसा करते-करते उन्हें 6 महीने हो गए और उन्हें आहार की प्राप्ति कहीं नहीं हुई और इस तरह से लगभग एक साल से ज्यादा समय बीत गया।
भगवान आदिनाथ प्रथम तीर्थंकर ने 1 वर्ष की तपस्या करने के बाद बैसाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि अर्थात अक्षय तृतीया के दिन इच्छुक रस (गन्ने का रस)से अपनी तपस्या का पारणा किया था इस कारण जैन समुदाय में यह दिन विशेष माना जाता है।
इस शुभ अवसर पर महिलाओं ने श्री 1008 महावीर दिगम्बर जैन मंदिर में भजन एवं नृत्य कर अक्षय तृतीया बहुत ही उत्साह पूर्वक मनाया।अंत में सभी श्रद्धालुओं को गन्ने का रस पेड़े प्रसाद में बांटे गये। महिलाओं में श्रीमती पूनम जैन, मणी जैन, मिनी जैन, ममता जैन, अन्जू जैन, मोनी जैन, शिखा जैन, आरती जैन, वर्षा जैन, आकांक्षा जैन, अन्जू जैन, गुंजा जैन, स्वीटी जैन आदि महिलाएं उपस्थित रहीं। सभी व्यवस्थाएं कन्हैया लाल जैन,कमल कुमार जैन, मयंक जैन ने संभाली

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ