संवाददाता आलोक
मथुरा । धर्मनगरी में स्वास्थ्य विभाग इन दिनों इलाज कम और ‘उगाही’ ज्यादा कर रहा है। मथुरा के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) कार्यालय में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो गई हैं कि यहाँ बिना ‘सुविधा शुल्क’ के सांस लेना भी दूभर है। आलम यह है कि अगर आप नियम-कायदों के पक्के हैं, तो आपका काम फाइलों के बोझ तले दबा रहेगा, और अगर जेब ढीली कर दी, तो सिस्टम रॉकेट की रफ्तार से दौड़
रजिस्ट्रेशन के नाम पर ‘अंधेरगर्दी’
वर्तमान में जिले के निजी क्लिनिकों के नवीनीकरण (Renewal) का सीजन चल रहा है। सरकार ने व्यवस्था तो ऑनलाइन की थी ताकि पारदर्शिता रहे, लेकिन यहाँ के ‘साहबों’ ने डिजिटल सिस्टम में भी भ्रष्टाचार का वायरस डाल दिया है। नियम पूरे होने के बाद भी चिकित्सकों के आवेदन पोर्टल पर हफ्तों तक ‘पेंडिंग’ शो होते रहते हैं।
डिप्टी सीएमओ की ‘खास’ कृपा
चर्चा है कि विभाग में तैनात एक ‘खास’ साहब की फाइलें तभी आगे बढ़ती हैं जब उन्हें ‘मिठाई’ का डिब्बा (रिश्वत) भेंट कर दिया जाए। जिन डॉक्टरों ने ‘साहब’ की पूजा ठीक से कर दी, उनका नवीनीकरण रातों-रात हो जाता है। बाकी ईमानदार डॉक्टर पोर्टल को निहारते रह जाते हैं या फिर दफ्तर के चक्कर काट-काटकर अपनी चप्पलें घिस रहे हैं।
विकलांगों को भी नहीं बख्शा
भ्रष्टाचार का सबसे घिनौना चेहरा तब दिखता है जब एक लाचार दिव्यांग को अपने हक के प्रमाण पत्र के लिए भी रिश्वत की मांग की जाती है। विभाग के बाबू और बिचौलिए मिलकर आम जनता की मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं। बिना ‘चढ़ावे’ के न तो विकलांग प्रमाण पत्र बन रहे हैं और न ही कोई दूसरा आवश्यक सर्टिफिकेट।
क्या कहते हैं पीड़ित?
नाम न छापने की शर्त पर एक निजी चिकित्सक ने बताया, “ऑनलाइन आवेदन सिर्फ दिखावा है। असली खेल तो सीएमओ ऑफिस के बंद कमरों में होता है। जब तक डिप्टी सीएमओ को खुश नहीं किया जाता, तब तक किसी न किसी कमी का बहाना बनाकर फाइल लटका दी जाती है।”
बड़ा सवाल: क्या सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ का भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ का दावा मथुरा स्वास्थ्य विभाग की चौखट पर आकर दम तोड़ रहा है? क्या उच्च अधिकारी इन ‘उगाही के केंद्रों’ पर कार्रवाई करेंगे या फिर भ्रष्टाचार की यह गंगा ऐसे ही बहती रहेगी?
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