कितने कमज़र्फ़ हैं हम

   जम्हूरियत का बेरहमी से ज़ब्ह हो रहा है फिर भी हम सिर्फ़ तमाशबीन हैं। इतिहास के पन्नों में जब चर्चा होगी यह घटना हमें शर्मसार या फ़ख्र फ़राज़ करेगी मालूम नही। अनुमान लगाना मुश्किल नही होगा कि औलादें ज़रूर शर्म से अपना सिर झुका लेगी सोचेंगी हमारे धमनियों में बहने वाला रक्त एक कायर का है। जो अपने फ़राइज से मुंह मोड़ चुका था। ज़ुल्म के आगे हथियार डाल चुका था। कर लिया था अपने ज़मीर का सौदा। जान की हिफ़ाज़त में मुल्क को लुट जाने दिया। शायद उसके दिमाग पर नशा था धर्म के झूठे आस्था का। आराध्य के नाम पर कुर्बान होने को तैयार था। कम अक्ल़़, कम इल्म़ की इससे बेहतर कोई मिसाल हो सकती है क्या? यकीनन नही।
      एकतरफा जंग नही है यह। आमने सामने है मनुवाद और अंबेडकरवाद। असामनता बनाम समानता की मृदुल भूमि पर यलगार हो रहा है। मनुवाद देश को अशिक्षित बनाना चाहता है और अंबेडकरवाद कानून का जानकर। अफ़सोस यह है कि जिन्हें अंबेडकरवादी होने का दर्प है वह धर्मांधता का विरोध करते तो हैं लेकिन एक बड़ी संख्या अपने जातीय नेता के खूंटे से ही बंधकर रहना चाहते हैं। अंबेडकरवाद प्रतीक है न्याय का, समानता का, बंधुत्व का, लोकतन्त्र और जनतंत्र का। यदि यह विचार भी संकीर्ण दायरे में सिमट जायेगा तब अन्य विचारधारा से नाउम्मीदी ही हाथ लगेगी। अंबेडकरवाद आपाधापी का नाम नही है। कार्य योजना है प्रबुद्ध भारत के निर्माण का। कैडर है विश्व की धरोहर की। एकीकृत है अपने लक्ष्य के प्रति। वाकई विश्वगुरू बनने की सलाहीयत है इनमें और सलीक: भी। अंबेडकरवाद कोई मौसमी उत्पादन नही है कि कुछ क्षणों में ही भंगुर हो जाए।
         विडंबना यह है कि इस विचार के लोग भी अपनी प्रवृत्ति को ही सर्वोच्च स्थान पर पदास्थापित करने पर अड़े हैं। अपनों के साथ खड़े होने की मनोवृत्ति को पूरी तरह से अनुचित भी नही ठहराया जा सकता है। यदि कुछ लोगों को दायरे में अपने को समाहित रखना है तब यह क़दम उचित है परन्तु देश की प्रगति, एकता, अखंडता, संप्रभुता अक्षुण्ण रखने के लिए सभी नागरिकों में बंधुता बढ़ाने की भावना का संचार होना अनिवार्य है। यह मनोयोग तभी संभव है जब हम निष्पक्ष विश्लेषण के लिए उपलब्ध होंगे। देश की प्रगति के लिए किया गया कार्य सराहनीय है चाहे वह अपने नेतृत्व ने किया है या फिर किसी और नेतृत्व ने। पक्षपात पूर्ण रवैया अनुचित है।
          विश्लेषण के लिए हमें ज्ञान, विवेक से भी इतर बड़े दिल का होना और दिखना भी चाहिए। दिल खोलकर प्रशंसनीय कार्य की सराहना और निकृष्ट कार्य की निंदा के लिए उपलब्ध होना चाहिए। जब हम एकांगी या एक पक्षीय हो जाते हैं तब हम मजबूत होने के बावजूद कमजोर हो जाते हैं। इस दशा में विचारों के क़रीब दिखने वाले वर्ग से हम सामंजस्य स्थापित नही कर पाते। एक दूसरे से बिखरे रहते हैं। हमारे बिखराव का नाजायज फायदा कुटिल, खल आसानी से उठा लेते हैं। नायकों के बिखराव का नतीज़ा यही निकलता है कि खलनायक देश को बर्बाद करने में सफल हो जाता है।
       लोकतंत्र में जनाकांक्षाओं के सम्मान को प्राथमिकता मिलनी चाहिए परन्तु हो रहा बिल्कुल विपरीत है। भारत जन कल्याणकारी देश है पूंजीवादी व्यवस्था को वरीयता नही दी सकती। कितनी अफ़सोस जनक स्थिति है सरकार दावा कर रही है कि हम देश के अस्सी करोड़ लोगों को मुफ़्त अनाज दे रहे हैं। क्या देश में कोई आपदा आ गई है जब सरकार को मुफ़्त अनाज वितरण की लिए मजबूर होना पड़ रहा है? आपदा राहत समयबद्ध कार्यक्रम है यह बाढ़ या सूखे की स्थिति में उपस्थित होता है, एक पाक्षिक, महीना या दो महीने में सम्पूर्ण हो जाता है। अनवरत व अनंत काल तक चलने वाली यह योजना पूंजीपतियों की गहरी साज़िश है। वह लोगों को मुफ़्तखोर बनाना चाहते हैं ताकि नागरिक अपनी प्रगति और मूलभूत अधिकारों के बारे में सोचना बन्द कर दें।
         सरकारी उपक्रमों को कौड़ियों के भाव उद्योगपतियों के हाथ बेचने की नीति स्पष्ट करती है कि सरकार और उद्योगपतियों के बीच सांठ गांठ है। दोनों का गठजोड़ देश की संपत्तियों को लूट लेना चाहता हैं। यह नही चाहते कि हमारे देश में लोकतन्त्र फले फूले। व्यक्तिगत तौर पर देश के नागरिक समृद्धिशाली हों। उद्योग जगत की रणनीति होती है एक बार मुफ़्त की आदत लग जाने दो फिर गन्ने की तरह चरखी में डालकर उनका रस निकाल लेंगे। मुफ़्त जिओ सिम का उदाहरण उपलब्ध है। स्मरण शक्ति पर ज़ोर डालते ही ज्ञात हो जायेगा कि ₹198 में 84 दिन का आने वाला कॉलिंग और डेटा पैक वर्तमान में ₹239 में 28 दिन पर ही संतोष करना पड़ रहा है।
        मुफ़्त राशन के नाम पर 80 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा के नीचे धकेल दिया गया है। चर्चा इस बिन्दु पर होनी चाहिए कि इतने लोग गरीबी रेखा के नीचे पहुंचे कैसे? सरकार की किन किन गलत नीतियों ने इतने लोगों को गरीबी रेखा के नीचे धकेला? कुटिल और धूर्त शासक हमेशा अपनी विफलता छिपाने के लिए दूसरे पर आरोप मढ़ते हैं। क्या हमारे देश में भी इसी तरह की सोच वाले शोषकों ने लोकतन्त्र की कमजोरी का लाभ उठाकर सत्ता के शीर्ष का अपहरण तो नही कर लिया है? सच है ऐसे शासक मुखालिफों की ज़ुबान बन्द कराने के तमाम उपक्रम करते हैं। उन्हें भयभीत रखने की जुगत में हर क्षण सक्रिय रहते हैं ताकि उनके साथ-साथ उनके समर्थकों को भी डरा कर रखा जा सके!
         लोकतन्त्र में आवश्यक है कि विकल्प खुले रखना चाहिए। संभव है एक नेता से जाने अनजाने में कोई त्रुटि हो गई हो। विपक्षी ताक़त में आने के बाद उनका मुंह बन्द करने में सफल हो रहे हों। ऐसी स्थिति में यदि दूसरा विकल्प मौजूद है तब गैर बराबरी की जड़ों को गहरे तक ले जाने वाली ताकतें आपके समानतावादी संगठन को इतनी बेरहमी से कुचल पाने में सक्षम नही होगी। देश की सत्ता जब क्रूर हाथों में चली जाती है तब सभी ख्यातिलब्ध नेता ख़ुद को बचाने में लग जाते हैं। गरीब, कमज़ोर, बेरोजगार, किसान, दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक की लड़ाई कुंद हो जाती है। आवश्यक है नए विकल्प की ख़ोज हो। नए को अंजाम और पुराने को विश्राम दिया जाए तभी समानता के पैरोकारों की एक मज़बूत लड़ाई नए कलेवर के साथ खड़ी हो पायेगी।
*गौतम राणे सागर*
  राष्ट्रीय संयोजक,
संविधान संरक्षण मंच।

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